मुसफ्फरगंज स्थित खेतान भवन में सात दिवसीय सत्संग एवं श्री राम कथा के पांचवें दिन विजयानंद गिरि ने कहा कि हम भगवान के हैं, भगवान हमारे हैं।
यह प्रेम का जनक है। भगवान में प्रेम बहुत विलक्षण और अलौकिक तत्व है।
प्रेम भगवान के साक्षात दर्शन से भी बहुत ऊंची चीज है।
उन्होंने कहा कि प्रेम त्याग, तपस्या आदि साधनों से नहीं होता, प्रत्युत भगवान में अपनेपन से होता है। यह मार्मिक बात है। जो चीज अपनी होती है वह स्वत: प्रिय लगती है।
केवल भगवान को पसंद आए। यदि भगवान को प्रिय लगे तो सब काम भगवान करेंगे। आपको कुछ नहीं करना होगा।