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अब मुस्कानें बेच रहा हूं, आंसू के बाजार में

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मिर्जापुर। अब मुस्कानें बेच रहा हूं, आंसू के बाजार में, रात-रात भर तुमको गाता सुबह छपे अखबार में। तुम बोलो तुमने जीवन में क्या खोया क्या पाया, किसके कंगन पहनकर निकली हो इस सावन में...। इस गीत के साथ ही गजेंद्र प्रियांशु ने जब आगाज किया तो लोग वाह-वाह कर उठे। गीतों के लिए प्रसिद्ध गजेंद्र ने अपने गीतों के माध्यम से कई ज्वलंत मुद्दे भी प्रस्तुत किए। व्यंग्य रचनाएं भी प्रस्तुत की। उनके चर्चित काव्य कर्ण-कुंती संवाद व सिया के राम के लिए लोग काफी व्यग्र रहे। इसपर उन्होंने सुनाया कि जब कुंती कर्ण के पास जाकर उनसे अर्जुन को नहीं मारने की विनती करती हैं तो सर्वप्रथम अपना व अपनी मां का परिचय उन्होंने कुछ यूं दिया। जलते सूरज का ताप हूं मैं, ऋषि दुर्वासा का शाप हूं मैं, मेरा जीवन वरदान नहीं, जीवन का अभिशाप हूं मैं। हे! कुरुकुल की महारानी मेरी मां हैं राधारानी। आंचल उसका पैबंद लगा लेकिन ममता की छाया है। रानी महारानी नहीं, सूत ने दूध पिलाया है, लेकिन उनकी उंगली ने पग- पग चलना सिखाया है। इन पंक्तियाें पर श्रोताओं ने जोरदार तालियों से उनका उत्साहवर्धन किया। होली की उमंग को बताते हुए सुनाया, रंग से रंग मिले इतने खुद रंग से नहा गई होली, साजन जिनके घर में हैं, इक उमंग लगा गई होली। राजनीति की अनिश्चितता को प्रकट करते हुए सुनाया कि ‘राह छोड़ो मेरी या मिलो राह में, बांह छोड़ों मेरी या ले लो बांह में, जो भी करना हो वह जल्दी करो, जाने क्या चल रहा है अमित शाह के मन में’। पत्नी-पति को होली में आने को कहती है। इसका वर्णन करते हुए सुनाया, योग वियोग का रंग लिखा है, कंत तुम्हें पत्र लिखा है, यदि फाल्गुन में नहीं आए पिया तो जीवन का अंत लिखा है। इसका उत्तर देते हुए सुनाया, प्यार के खाते में मैने तेरी हर एक अदा का हिसाब लिखा है, तूने अक्षर ढाई लिखा है, मैंने पूरी किताब लिखी है। तूने कहा जवाब लिखना मैंने तुझे लाजवाब लिखा है।
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