मां विंध्यवासिनी के भव्य शृंगार और मंगला आरती के उपरांत कपाट दर्शनार्थियों के लिए खोल दिए गए। न्यू वीआईपी रोड जयपुरिया गली, सदर बाजार और पक्का घाट गली में लगी लंबी कतारों में खड़े माता के भक्त मां का जयघोष करते हुए मंदिर की तरफ बढ़े चले जा रहे थे।
विंध्य दरबार पहुंचने के बाद भक्तों ने बड़े श्रद्धा भाव से मत्था टेका। विंध्याचल मंदिर परिसर में विराजमान देवी देवताओं का तरह-तरह के पुष्पों से किया गया भव्य शृंगार का दर्शन पाकर श्रद्धालु निहाल हो उठे। गंगा घाटों पर सूर्योदय के पूर्व से लेकर से दोपहर बाद तक स्नान करने वालों भक्तों का तांता लगा रहा।
मां का दर्शन पूजन करने के बाद बड़ी संख्या में आस्थावान मंदिर के गुंबद और हवन कुंड का परिक्रमा कर पुण्य के भागी बने दूरदराज से आए श्रद्धालुओं ने मां विंध्यवासिनी का दर्शन-पूजन करने के बाद तेज धूप और भीषण गर्मी की परवाह किए बगैर अष्टभुजा पहाड़ी पर नंगे पांव त्रिकोण परिक्रमा करके सुख समृद्धि की कामना की।
देवी मंदिरों में दर्शन पूजन करने के उपरांत भक्तों ने विंध्य की गलियों में सजी तरह-तरह की दुकानों पर पहुंचकर खरीदारी भी की। माला-फूल, प्रसाद और नारियल चुनरी की दुकानों पर भक्तों की भारी भीड़ को देखकर दुकानदार भी गदगद नजर आए।
माता की आरती उतारते पुरोहित।
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चैत्र नवरात्र के दूसरे दिन काली खोह व अष्टभुजा मंदिर भी भक्तों से पटा रहा। मां विंध्यवासिनी का दर्शन करने के बाद श्रद्धालु काली खोह पहुंच गए। माता काली का दर्शन पूजन किया। मां काली के दर्शन के पश्चात किसी ने रोप-वे तो किसी ने मंदिर के पीछे मौजूद सिढ़ी के सहारे पहाड़ पर चढ़कर दुर्गम रास्तों के बीच होकर अष्टभुजा मंदिर पहुंच कर दर्शन किया।
अष्टभुजा पहाड़ पर पानी के लिए तरस रहे श्रद्धालु
चैत्र नवरात्र मेले में अष्टभुजा पहाड़ पर पेयजल सप्लाई बंद होने के बाद अनाउंसमेंट होने के बाद पानी की सप्लाई शुरू किए जाते हैं लेकिन कुछ देर बाद बंद कर दिए जाते हैं जिससे श्रद्धालु बूंद बूंद पानी के लिए तरस रहे हैं। तेज धूप में काफी दूर पैदल चलने के उपरांत पीने का पानी पर्याप्त मात्रा में जलापूर्ति नहीं हो पा रहा है।
त्रिकोण मार्ग पर देश के कोने-कोने से आए श्रद्धालु पानी के लिए पहाड़ पर दर-दर भटकने के लिए मजबूर हैं। नल तो लगे हुए हैं लेकिन उसमें टोंटी नदारद है। हैंडपंप तो लगें हुए हैं लेकिन पानी उगलता नहीं जल स्तर नीचे होने के कारण पानी के लिए पहाड़ पर श्रद्धालुओं के साथ छोटे-छोटे दुकानदारों को भी पीने के पानी के लिए तरसना पड़ रहा है।
प्रमुख झरने सीताकुंड, भैरव कुंड, मछिंद्रा कुंड एवंका जल स्रोत धीरे-धीरे कम होने लगा है जिसके कारण हलक बुझाने के लिए पानी मिल रहे हैं लेकिन पर्याप्त मात्रा में जल स्रोत नहीं आ रहा है। हालांकि त्रिकोण परिक्रमा पथ पर विभाग एवं सामाजिक संगठनों द्वारा निशुल्क प्याऊ चलाए जा रहे हैं जिससे कुछ राहत मिल रहे हैं।
बैसवारा समाज भाव पूजा में रखता है विश्वास
विंध्यधाम में भाव और भक्ति देखनी हो तो चैत्र नवरात्र के प्रथम दिन से पंचमी तक आने बैसवारा समाज की भक्ति देखी जा सकती है। बैसवारा समुदाय की पूजन पद्धति भाव पर आधारित होती है। इसमें परिवार के सभी सदस्य नया सफेद वस्त्र धारण कर मां विंध्यवासिनी का दर्शन करते हैं।
ये मंत्र से ज्यादा भाव से आराधना करते हैं। बैसवारा समाज के भक्तों के गले में एक कपड़े की पंखे जैसी माला होती है, जिसे यह रास्ते भर डोलाते चलते हैं। जिसे हंकनी कहते हैं। मां के चंवर डोलाने की भाव से यह जुड़ी है। साथ ही ये आटे से बने दीपक का ही इस्तेमाल करते हैं।
भक्ति रस में सराबोर कर देते हैं। विंध्याचल के तीर्थ पुरोहित प्रेमशंकर मिश्र ने बताया कि उन्नाव, रायबरेली, लखनऊ, बुंदेलखंड, कानपुर देहात से इस समाज के लोग मां का दर्शन पूजन करने यहां आते हैं। नवरात्र की पंचमी को दर्शन-पूजन करके चले जाते हैं।
मां विंध्यवासिनी के दरबार में वैसवारा समाज का नाता प्राचीन काल से है। कहा जाता है कि 1200 ई. के आसपास बैसवारा समाज में मध्यप्रदेश के छतरपुर में मां के अनन्य भक्त भानु भगत हुआ करता था। उन्हें मां के साक्षात दर्शन होते थे।
एक बार भानु भगत ने मां से कहा कि आप उसके निवास पर चलिए, ताकि उसे यहां न आना पड़े। मां ने कहा कि यदि तुम मेरे विग्रह को ले जाना ही चाहते हो तो रास्ते में उसे कहीं मत रखना। मां के ऐसा कहने पर भानु भगत ने माता की शर्त को स्वीकार किया। और मां के विग्रह को भक्त मंडली के साथ ले जाने लगा। जब भानु भगत प्रयाग की धरती पर पहुंचे तो थक गए, विग्रह को वहीं रख दिया।
शर्त के अनुसार ऐसा करने पर मां वहां से अलोप हो गईं और विंध्याचल में आकर विराजमान हो गईं। प्रयाग में जहां से मां अलोप हुईं वहीं प्रयागराज जनपद के अलोपी बाग में स्थित मां अलोपी हैं। जहां मां की पूजा बिना विग्रह के होती है।
काली खोह पहाड़ी व अष्टभुजा की पहाड़ी पर इन दिनों पत्थर नहीं मिल रहे हैं कि लोग छोटा सा घरौंदा बना सकें । ऐसे में लोग पहले बने घरौंदों के टूटे पत्थरों से नया घरौंदा बना रहे हैं। मान्यता है कि जो लोग नवरात्र में अष्टभुजा पहाड़ पर पत्थरों को जोड़ कर घरौंदा बनाते हैं, उनके मकान बनने की मन्नत अवश्य पूरी होती है।
अष्टभुजा पहाड़ अपने आप में सिद्धि स्थल माना जाता है। कहा जाता है कि यहां आकर गलत काम करने वाले का निश्चित तौर पर नुकसान होता है। अच्छी सोच और पवित्र मन से मांगी गई मुराद अवश्य पूरी होती है। वर्षों से यहां नवरात्र में पहुंच कर मां के भक्त पहाड़ के पत्थरों से घरौंदे बनाते हैं।
यहां पत्थर से घर बनाने के लिए दूर-दूर से पहुंचते हैं और अपने सपनों का घर मां के आशीर्वाद से प्राप्त करते हैं। जिन लोगों को मां का आशीर्वाद प्राप्त होता है, वे अपने सगे संबंधियों को लेकर नवरात्र में यहां पहुंचते हैं और उनसे भी घरौंदे बनवाते हैं। इन दिनों यहां थोड़ी-थोड़ी दूरी पर हजारों घरौंदे बने दिख जाएंगे।
उन्नाव से आए प्रेम गुप्ता ने बताया कि किसी से सुना था कि यहां नवरात्र में घरौंदा बनाने से मकान की अभिलाषा पूरी होती है इसलिए मां के धाम में आया हूं। सासाराम बिहार से आए राम कुमार पाण्डेय का कहना है कि अष्टभुजा पहाड़ की मान्यता को आजमाया तो नहीं जा सकता है लेकिन मां के आशीर्वाद से लाभान्वित जरूर हुआ जा सकता है। मकान की कामना से यहां घरौंदा बना रहा हूं। उम्मीद है मकान बनाने का सपना पूरा होगा।
श्रद्धालुओं की सुविधा बढ़ी, मिली एक और गोल्फ कार्ट
श्रद्धालुओं की सुविधा को ध्यान में रखते हुए दान में नई गोल्फ कार्ट मिली है। नगर विधायक पंडित रत्नाकर मिश्र ने जिलाधिकारी प्रियंका निरंजन की मौजूदगी में इसे हरी झंडी दिखाई। चैत्र नवरात्रि में आने वाले यात्रियों को अधिक सहूलियत होगी।
यह सुविधा श्रद्धालुओं के आवागमन को सुगम बनाने के साथ-साथ विंध्याचल धाम के समग्र विकास में भी अहम भूमिका निभाएगी। अब गोल्फ कार्ट की कुल संख्या पांच हो गई है। इस अवसर पर महेंद्र जायसवाल, विपिन पांडेय, अनुराग त्रिपाठी, संजय कटारे, अभिषेक कुशवाहा, अंकित तिवारी व शंकर साहू उपस्थित रहे।
लगाया गया नि:शुल्क स्वास्थ्य शिविर
काली खोह में भारत विकास परिषद् एवं दवा व्यवसायियों के सहयोग से वासंतिक निशुल्क स्वास्थ्य शिविर लगाया गया है। मुख्य अतिथि नगर विधायक पंडित रत्नाकर मिश्र रहे। कार्यक्रम के दौरान चिकित्सकों एवं अन्य स्वास्थ्य कर्मियों द्वारा जरूरतमंद मरीजों की जांच की तथा उन्हें आवश्यक परामर्श व औषधियां प्रदान की।