विंध्यवासिनी देवी ज्ञान का दान देती हैं। विंध्याचल धाम को जागृत पीठ माना जाता है। यहां वैदिक व वाम मार्गी दोनों पद्धतियों से पूजन होता है। कहते हैं कि मां विंध्यवासिनी दस महाविद्या के साथ विराजमान हैं। यहां जगदंबा अपनी त्रिगुणात्मक शक्ति महाकाली, महालक्ष्मी व महासरस्वती के रूप में त्रिकोण का निर्माण करतीं हैं।
विंध्य से मुनि अगस्त्य ने संस्कृति के प्रचार प्रसार की यात्रा शुरू की थी। यहीं सप्त ऋषियों को ज्ञान प्राप्त हुआ। मां विंध्यवासिनी का पूजन वैदिक रीति से होता है जबकि इनकी दस महाशक्तियों का पूजन वाममार्गी तांत्रिक पद्धति से होता है।
विंध्य क्षेत्र महाकाली, महालक्ष्मी एवं महासरस्वती की यात्रा है, जो इच्छा, ज्ञान एवं क्रिया की देवियां हैं। तीर्थ पुरोहित पं. त्रियोगी नारायण मिश्र जी ने बताया कि संसार में रजोगुण की प्रधानता है। ऐसे में सबसे पहले रजोगुण स्वरूपा महालक्ष्मी मां विंध्यवासिनी का दर्शन करना चाहिए। उसके तमोगुणी स्वरूप महाकाली और सतोगुणी स्वरूप महासरस्वती अष्टभुजा के दर्शन करते हैं।
यह दर्शन त्रिकोण कहलाता है।
मां विंध्यवासिनी के शृंगारिया शिवजी महाराज वंशा परंपरा से मां की सेवा करते चले आ रहे हैं। उनका कहना है कि मुझसे ज्यादा सौभाग्यशाली कोई नहीं है क्योंकि मुझे विरासत में मां की सेवा का अवसर मिला है। मां के शृंगारिया त्रिलोक मोहन मिश्रा ने बताया कि वे वर्षों से मां विंध्यवासिनी की सेवा कर रहे हैं। माता के पूजन-आरती करते समय जो अनुभूति होती है, उसका वर्णन संभव नहीं है। मां का श्रृंगार एवं पूजन करने से परम आनंद की प्राप्ति होती है।