मिर्जापुर। पति की मौत के बाद पटेहरा ब्लॉक की मलुआ निवासी शिवकुमारी ने संघर्ष किया और बच्चों को पिता की तरह सहारा दीं। अभी वह वह लखपति दीदियों में शामिल हैं। शिवकुमारी जब गर्भवती थीं, उसी समय पति की मृत्यु हो गई। नातेदार और रिश्तेदार भी किनारे हो गए लेकिन शिवकुमारी ने हिम्मत नहीं हारी। उसने अजन्मे बच्चे के लिए संघर्ष की ठानी। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के समूह से संपर्क किया। वह जय मां दुर्गा स्वयं सहायता समूह के साथ जुड़ीं। पहले चरण में दो बार में 74000 रुपये का ऋण लीं। उससे शिवकुमारी ने वाराणसी से शृंगार सामग्री खरीदी और अपने बेटे के नाम पर शौर्य स्टाेर खोला। सिलाई भी की और दुकान भी चलाई। इससे उन्हें प्रतिमाह आठ से 10000 रुपये की आमदनी होने लगी। फरवरी 2018 में ऋण लिया था जिसे दिसंबर 2018 तक चुका दिया। इसके बाद वर्ष 2019- 20 में उन्होंने 668 परिषदीय विद्यालयों का ड्रेस तैयार किया। जिससे 60,665 रुपये की आमदनी हुई। उसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा और लगातार मेहनत कर आजीविका कमाई। अब उनका नाम लखपति दीदियों में शुमार है।
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घाट पर चलती है दो सहेलियों की पाठशाला
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मिर्जापुर। कोविड के समय जब स्कूल, कॉलेज बंद थे, दे सहेलियों ने गरीब बच्चों को पढ़ाने का जिम्मा उठाया। घाट पर शुरू हुई गरीब बच्चों की क्लास आज भी चलती है। जब घाट पर क्लास नहीं चलती है तो ऑनलाइन क्लास चलाई जाती है। महुवरिया निवासी शिखा मिश्रा 2020 में बीएचयू से एमए कर रही थीं। सहेली पूर्णिमा सिंह केबी से बीए कर रही थीं। कोविड के चलते कॉलेज बंंद था। लॉकडाउन खत्म होने के बाद सितंबर 2020 में दोनों ने गरीब बच्चों को पढ़ाने का जिम्मा उठाया। बरियाघाट पर शाम को दो घंटे के क्लास शुरू की। तीन बच्चों से कक्षा की शुरुआत हुई। इसमें एलकेजी से लेकर कक्षा पांच तक के बच्चे आने लगे। बच्चों को पढ़ाने के लिए लाइब्रेरी भी शुरू की। इसमें ज्ञानपरक किताबें उपलब्ध कराई गईं। पढ़ाई के साथ बच्चों को चित्रकारी और अन्य प्रतियोगिताएं कराती हैं। दोनों सहेलियां अब तक 100 से अधिक बच्चों को पढ़ा चुकी हैं। इस समय 30 बच्चे पढ़ते हैं। पढ़ाई के साथ सफाई के लिए नो पॉलिथिन का अभियान चलाने पर नगर पालिका ने दोनों सहेलियों को ब्रांड एंबेस्डर बनाया था।
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गरीबी में पली नक्सल गांव की बेटी बनी देश की उड़नपरी
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अदलहाट। कड़ी मेहनत, बुलंद हौसले के बदौलत नक्सल प्रभावित राजगढ़ ब्लॉक के सोनपुर गांव की बेटी चंदा गरीबी में पलते हुए देश की उड़नपरी बन गई। राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में गोल्ड और सिल्वर मेडल जीतने वाली चंदा का सपना देश के लिए ओलंपिक में गोल्ड मेडल जीतने का है। वह दिल्ली के भारतीय खेल प्राधिकरण (साईं) में में कोचिंग कर रही हैं। अंतरराष्ट्रीय एथलिक केएम चंदा ने फरवरी में उत्तराखंड में चल रही 38वीं राष्ट्रीय खेल प्रतियोगिता के 800 मीटर दौड़ में पिछले वर्ष के अपने ही रिकॉर्ड को ध्वस्त करते हुए लगातार दूसरे वर्ष स्वर्ण जीता । इसी वर्ष राष्ट्रीय खेल के 1500 मीटर दौड़ में भी चंदा ने स्वर्ण पदक जीता था। विदेशों में नाम रौशन कर रही चंदा के परिवार की माली हालात ठीक नहीं है। चंदा को इस मुकाम पर पहुंचाने के लिए अपनी माता-पिता ने जमीन तक गिरवी रख दिया था। बेटी देश के लिए पदक जीत रही है लेकिन प्रशासन व सरकार इस खिलाड़ी को एक सरकारी आवास तक मुहैया नहीं करा सका है।
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दो जुड़वा बच्चों की मां श्वेता चुनरी होल सेल दुकान को आगे बढ़ा रहीं
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मिर्जापुर। विंध्याचल के दिवानघाट निवासिनी श्वेता जायसवाल दो जुड़वा बच्चों के साथ पति के निधन के बाद होल सेल की चुनरी की दुकान को आगे बढ़ा रही हैं। श्वेता के पति दामोदर जायसवाल का लगभग छह वर्ष पहले वर्ष 2021 में अचानक निधन हो गया। उस वक्त उसके पास दो छोटे-छोटे जुड़वा बच्चों में बेटी ज्ञानवी और उत्कर्ष आज पढ़ाई के साथ ही काम में हाथ बंटा रहे हैं। दोनों बच्चे कक्षा नौ में पढ़ रहे हैं। श्वेता का कहना है कि आज वह पति के विरासत को संभाल रही है। चुनरी होल सेल दुकान से वह अपना और बच्चों की परवरिश कर रही हैं।