हौसला बुलंद हो तो एवरेस्ट की ऊंचाइयां भी मामूली दिखती है। कुछ इसी हौसले के साथ पैरों से निःशक्त लोक गायिका उषा गुप्ता अपने सपनों को पंख लगाने में जुटी हैं।
दो वर्ष की उम्र में पैरों के साथ छोड़ देने के बाद से उन्होंने अपने गले को अपनी ताकत बना ली। उन्होंने संगीत शिक्षा के माध्यम से न केवल समाज में अपना स्थान बनाया बल्कि अगली पीढ़ी को संगीत की बारीकियां सिखाने में लगन से जुटी हैं।
नगर के महुवरिया की निवासिनी उषा गुप्ता को दो वर्ष की उम्र में ही पोलियो ने अपना शिकार बना लिया। इससे वह पैरों पर खड़ी नहीं हो सकीं। बचपन से ही संगीत की ओर रुझान होने पर उषा ने एमए तक की पढ़ाई के बाद प्रयाग संगीत संस्थान से संगीत में प्रभाकर की डिग्री हासिल की और अपने सपनों को साकार करना शुरू कर दिया।
बड़े परिवार में पली उषा को परिवार के ही कई लोगों ने संगीत में जाने से रोकने के लिए दबाव बनाया तो पिता केदारनाथ और मां सुशीला देवी कवच बनकर खड़ी हो गईं। पालनहारों का साथ मिला तो उषा ने ऊंचाइयों को छूना शुरू कर दिया।
वाराणसी, मिर्जापुर, इलाहाबाद, लखनऊ के मंचों पर उषा ने कजली के माध्यम से सुरों के रंग बिखेरे तो साहित्यकार सम्मेलन में उन्हें कजली कादंबिनी और त्रिवेणी संस्था द्वारा कजली प्रिया की उपाधि से नवाजा गया। सैफई महोत्सव, भोजपुरी महोत्सव, आदिवासी लोककला महोत्सव में उन्होंने कजली की विधा को बेहतरीन बना दिया।
उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र इलाहाबाद और संस्कृति निदेशालय लखनऊ ने उन्हें कार्यशालाओं में बच्चों को संगीत सिखाने के लिए जिम्मेदारी सौंपी है। ग्रीष्मकालीन और शीतकालीन अवकाश में उषा शहर में भी बच्चों की आवाज को निखारने में जुटी रहती हैं। उषा का प्रयास है कि लोग उन्हें उनकी आवाज के लिए जानें।