मिर्जापुर शहर कोतवाली से चंद कदम दूर छोटी गुदरी मोहल्ले के जर्जर मकान की छत जब बुधवार की भोर में गिरी तो कमरे के अंदर सो रहे लोग मलबे में दब गए। दरवाजे खोलने का प्रयास किया गया लेकिन वह जाम हो गया था। बाद में उसे काटकर निकाला गया। फिर मलबा हटाने, निकालने की योजना बनाने और यह सब करने में काफी वक्त लग गया। तब तक दंपती और उनके तीन बच्चों की सभी की सांसें थम चुकी थीं। अगर जल्दी इन लोगों को बाहर निकाल लिया जाता तो शायद जान बच जाती।
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दरअसल, मकान के ऊपरी तल की छत भूतल की छत पर गिरी और फिर मलबे के भार से भूतल की छत भी नीचे आ गई। छत में लकड़ी के बड़े-बड़े धरन के साथ पटिया भी थी। इनका भार क्विंटल में था। जब छत गिरी तो पड़ोसियों ने कोतवाली में सूचना दी। इसके बाद शहर कोतवाली पुलिस पहुंची। मलबे में पांचों लोग दब गए थे। स्थानीय लोगों और पुलिस ने दरवाजा तोड़कर मलबा निकालने का प्रयास किया, लेकिन यह पुलिस और फायर ब्रिगेड कर्मियों के वश की बात नहीं थी। ऐसे में एनडीआरएफ की जरूरत थी, परंतु वह नहीं आ सकी। पुलिस और फायर ब्रिगेड के जवान ही मलबा हटाते रहे। इसके चलते पहला शव निकालने में तीन घंटे से अधिक समय लग गया। शुभम बिंद को निकाला गया तो उसकी सांस चल रही थी। अगर रेस्क्यू अभियान में तेजी लाई जाती तो जानें बचाई जा सकती थीं। पुलिस और फायर ब्रिगेड के जवानों ने छह घंटे तक चले रेस्क्यू अभियान के बाद पांचों शवों को निकाला। एनडीआरएफ आई होती तो कम समय में मलबा हटाकर जान बचाई जा सकती थी।
पिता का शव निकलने के बाद बेहोश हो गई पुत्री
- फोटो : अमर उजाला
हादसे के बाद चीख पुकार से दहल गया क्षेत्र
भोर में छत गिरने की आवाज से हर कोई दहल उठा। जब लोग घरों से बाहर आए तो हादसे का मंजर देखकर रूह कांप गई। इसके बाद चारों ओर चीख पुकार ही सुनाई दे रही थी। परिवारीजनों और मोहल्ले के लोगों ने मलबा हटाने का प्रयास किया, परंतु उनके वश का कुछ नहीं था। इसके चलते लोग असहाय नजर आने लगे। बचाव कार्य शुरू होने पर वे भगवान से मिन्नत कर रहे थे कि सब कुछ ठीक रहे। परंतु एक के बाद एक शव बाहर निकलते रहे और लोगों की आस खत्म होती गई।
भोर में दो छतों का मलबा गिरने से धमाके जैसी आवाज हुई और कंपन से आसपास के लोगोंकी नींद खुल गई। अगल-बगल के किराएदार ही नहीं, बल्कि आसपास के लोग घर से बाहर आ गए। लोगों ने देखा तो उमाशंकर के भाई का परिवार मदद की गुहार लगा रहा था। लोगों ने मदद का प्रयास किया, परंतु दरवाजा बंद था।
मकान मालिक के यहां आए सरोज नाथ योगी व अन्य ने दरवाजा तोड़ने का प्रयास किया, तब तक पुलिस भी आ गई। किसी तरह से जब दरवाजा तोड़कर निकाला गया तो अंदर का मंजर देख लोगों का दिल दहल गया। लोग बचाव कार्य करते भी तो कैसे, कई फीट ऊंचा मलबा कमरे में था। पुलिस और फायर ब्रिगेड के जवान किसी तरह से लकड़ी के धरन और पटिया को बाहर निकालते रहे, परंतु मलबे में दबे लोगों का पता नहीं चल सका। तीन घंटे बाद शुभम बिंद को निकाला गया। पुलिस मलबे में दबे लोगों को निकालकर 108 एंबुलेंस से सीधे अस्पताल भेज दे रही थी। वहीं मर्माहत परिवार के लोग मलबा में दबे लोगों के निकलने पर चीखने लगते थे। उनके रोने और चीखने की आवाज से हर कोई गमगीन हो जा रहा था। एक-एक कर जब मलबे से शव निकलने लगे तो परिजनों की आस भी धूमिल पड़ने लगी।
पिता का शव निकलने के बाद बेहोश हो गई पुत्री
उमाशंकर, उनकी पत्नी और उनके तीन बच्चे हादसे का शिकार हो गए। सिर्फ एक पुुत्री बची है, जो ननिहाल में थी। उमाशंकर की सबसे बड़ी पुत्री सपना (23) बीए की छात्रा है। वह बचपन से ही नानी के घर कटोरागंज वाराणसी में रहती थी। उमाशंकर पत्नी गुड़िया और पुत्री संध्या, शुभम और सौरभ के साथ यहीं पर रहते थे। हादसे की सूचना पर सपना वाराणसी से आई। उसकी आंखों के सामने उसके भाई-बहन और माता-पिता का शव निकाला गया। पिता का शव बाहर आने पर वह लिपटने के लिए पापा-पापा चिल्लाते हुए दौड़ी। महिला थानाध्यक्ष सीमा सिंह ने उसे पकड़ा और संभाला। सपना की हालत देखकर डीएम प्रवीण कुमार लक्षकार, सीओ सिटी प्रभात राय उसके पास पहुंचे और उसे समझाया। रह-रह कर वह बेहोश हो जा रही थी। उसे डाक्टर के पास ले जाकर इलाज कराया गया।
मोटर बाइंडिंग का काम करता है परिवार
उमाशंकर भाइयों में दूसरे नंबर पर थे। उनके बड़े भाई शिवशंकर और सबसे छोटे भाई दयाशंकर हैं। तीनों भाई मोटर बाइंडिंग का कार्य करते रहे हैं। शिवशंकर का परिवार मकान में ही बगल के कमरे में रहता है। उमाशंकर और दया शंकर एक साथ बने दो कमरों में रहते थे। घंटाघर पावर हाउस के पास दोनों की दुकान है। नगरपालिका का भी कार्य करते थे। उमाशंकर के दोनों पुत्र शुभम और सौरभ हाईस्कूल के बाद पढ़ाई छोड़कर पिता के साथ दुकान पर हाथ बंटाते थे।
बाल-बाल बच गया दयाशंकर का परिवार
उमाशंकर और दयाशंकर का परिवार एक ही मकान में रहता था। किराए का जो मकान है, उसमें उनकी तीसरी पीढ़ी रह रही है। मकान में दो कमरे हैं। आगे वाले कमरे में दयाशंकर, उनकी पत्नी गीता देवी, 13 वर्षीय पुत्र निक्की और 10 वर्षीय पुत्र छोटू रहते हैं। पीछे वाले कमरे में उमाशंकर बिंद अपनी पत्नी और तीन बच्चों के साथ रहते थे। रात को पीछे वाले कमरे की ही छत गिरी। आगे वाले कमरे की छत नहीं गिरी। इससे दयाशंकर का परिवार बाल-बाल बच गया।
देर रात पत्नी के साथ घर लौटे थे उमाशंकर
उमाशंकर सोनभद्र के कर्मा स्थित अपनी मामी के घर पर कार्यक्रम में शामिल होने के लिए पत्नी गुड़िया के साथ गए थे। रात को सभी लोग दोनों को रोक रहे थे, पर गुड़िया ने कहा कि वह नहीं रुकेगी। उसके बच्चे घर पर अकेले होंगे। इसके बाद उमाशंकर पत्नी को बाइक से लेकर घर आए। रात को 12 बजे उनके भाई ने दरवाजा खोला। इसके बाद पीछे के कमरे में दोनों सोने चले गए। उसी कमरे में तीनों बच्चे भी सो रहे थे। दो दिन पूर्व गुड़िया और उनकी पुत्री संध्या भी वाराणसी गई थीं।
लोहंदी में ली थी जमीन
उमाशंकर ने लोहंदी में जमीन ली है। लोगों ने बताया कि उन्होंने लोहंदी में मकान बनवाया है। इस मकान को छोड़कर वहां शिफ्ट होने वाले थे, पर किसी कारणवश ऐसा नहीं हो सका। लोग चर्चा कर रहे थे कि अगर वह यह मकान छोड़कर शिफ्ट हो गए होते तो, आज उनका परिवार सही सलामत रहता।
सीएम ने जताया दु:ख, मृतकों के परिजनों को दो-दो लाख देने का निर्देश
छत गिरने से एक ही परिवार के पांच लोगों की मौत की घटना पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी दु:ख जताया है। मुख्यमंत्री ने मृतकों के परिजनों को दो-दो लाख रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया।