जिले में खेल के बागवां को जिन पर बढ़ावा देने का भार था उन्होंने अपने कर्तव्य का पालन किया होता तो आज मिर्जापुर के खेल की तस्वीर कुछ और होती।
13 वर्ष बीत गए चार करोड़ रुपये भी खर्च हुए लेकिन स्टेडियम अब तक तैयार नहीं हो सका है। जाहिर सी बात है कि किसी ने इस ओर ध्यान नहीं दिया। हालत यह है कि खेल तो संवर रहा है लेकिन उधार के मैदानों में।
जिले में खेल की दुर्दशा के लिए खिलाड़ी नहीं प्रशासनिक अधिकारी ही जिम्मेदार रहे हैं। यूं तो मुख्यालय में खेल मैदानों की कमी नहीं है लेेकिन संवारने को कौन कहे खेलने लायक भी नहीं छोड़ा जा रहा है।
शासन ने कोच तो दे दिए लेकिन स्टेडियम के निर्माण की सुधि नहीं ली, लिहाजा कोच बैठे बिठाये वेतन पा रहे हैं और खिलाड़ी जैसे तैसे अपने खेल को निखारने को विवश हैँ।
बिना फुटबाल कोचिंग के ही नगर की खिलाड़ी परवीन यूपी अंडर 16 टीम की कप्तानी कर चुकी। विन्ध्याचल मंडल की बालाओं ने बिना सरकारी कोच के ही 18 मंडलों की राज्य स्तरीय चैंपियनशिप में दूसरा स्थान प्राप्त किया।
इससे इनकी प्रतिभाओं को पहचाना जा सकता है। खेलों को बढ़ावा देने को कौन कहे सरकारी अधिकारी तो खेलों की बधिया उधेड़ने में लगे हैं। दो दिन होने वाले ट्रायल को एक ही दिन में सिमटाया जा रहा है।
कोच को प्राइवेट स्कूूलों में तैनात किया जा रहा है। जिला स्तरीय खेल जिला मुख्यालय पर नहीं बल्कि 40 किलोमीटर दूर आयोजित किए जा रहे हैं। खिलाड़ी इसके विरोध में प्रदर्शन कर रहे हैं लेकिन कोई सुनवाई नहीं हो रही है।
खेल के विकास के लिए हर माह लाखों रुपये का बजट आ रहा है लेकिन बिना प्रतियोगिताओं के अभाव में इसको कहां खर्च किया जाता है इसका पता नहीं है।
जिलाधिकारी राजेश कुमार सिंह का कहना है कि खेल की स्थानीय प्रतिभाओं को आगे बढ़ाने के लिए प्रयास किए जाएंगे।
प्रयास होगा कि स्टेडियम का निर्माण जल्द कराया जाए। खेल के विकास के लिए समितियों का गठन किया जाएगा।