जिले में पहाड़, झरने, जलाशय और प्राकृतिक सुषमा की कमी नहीं लेकिन सबसे ज्यादा लोगों को यहां आस्था ही खींचकर लाती है। विंध्याचल, अष्टभुजा और काली खोह के त्रिकोण पर पथ पर साल भर श्रद्धालु आते हैं। वासंतिक और शारदीय नवरात्र के 18 दिनों में ही यहां 40 से 50 लाख आस्थावान आते हैं। प्रशासन ने जिले के पर्यटन स्थलों का विकास नहीं किया है। यहां तक कि विंध्याचल धाम में भी बुनियादी सुविधाओं का अभाव है।
जिले में पर्यटन स्थलों की भरमार है जहां प्रतिवर्ष बारिश के मौसम से लेकर जाड़े तक पर्यटकों की भरमार रहती है लेकिन इन स्थलों का विकास नहीं होने के कारण यहां आने वाले सैलानियों को सुविधा नहीं मिल पाती है। लखनिया दरी, चूना दरी, लोअर, अपर खजुरी, विंढम फाल, सिद्धनाथ की दरी जैसे दर्जनों पहाड़ी झरने सैलानियों को बरबस अपनी ओर आकर्षित करते हैं लेकिन प्रशासनिक कवायद की कमी के कारण इन स्थानों पर पर्यटकों को सुविधाओं में अब तक कोई बढ़ोतरी नहीं हुई है। यही हाल है कि पर्यटन स्थलों पर न तो बैठने की व्यवस्था हुई है और न ही सुरक्षा की जिसके कारण प्रतिवर्ष दर्जनों सैलानियों की प्राक़ृतिक दहों में डूबने से मौत हो जाती है।
धार्मिक पर्यटन स्थल के नाम पर आस्था का सबसे बड़ा केंद्र आदि शक्तिपीठ मां विन्ध्यवासिनी का धाम यहां विद्यमान है जो जिले में बाहरी लोगों के आवागमन का सबसे बड़ा कारण है। यहां प्रति नवरात्र बीस लाख के आसपास लोगों का आगमन होता है।
इसके इलावा भी नये वर्ष के प्रथम दिन और हर माह की पूर्णिमा तथा अन्य त्योहारों पर यहां लाखों की संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। बावजूद इसके आस्था के इस केंद्र की हालत बेहतर नहीं हो पा रही है। नवरात्र को छोड़ अन्य दिनों में यहां की व्यवस्था खराब ही रहती है। न तो पर्याप्त बिजली आपूर्ति होती है और न ही सफाई की व्यवस्था रहती है। सुरक्षा के नाम पर भी कोई खास व्यवस्था नही है जिसके चलते यहां अराजकता का माहौल बना रहता है।