बदलती जीवन शैली के चलते अब ग्राम्यांचलों में पारंपरिक होली गीत सुनाई नहीं देते हैं। होली के एक माह पूर्व से गांव की चौपाल पर ढोल और मंजीरे लेकर लोग इन गीतों का अभ्यास करने लगते थे।
आदिवासी समाज के लोगों के बीच होली गीत की एक अलग ही पहचान थी।
होली के एक माह पूर्व ही गावों में ढोल-मंजीरे की थाप पर होली गीत का अभ्यास शुरू हो जाता था, लेकिन वर्षों से देखा जा रहा है कि आधुनिक जीवन शैली प्राचीन पारंपरिक लोक संस्कृति को पीछे छोड़ती चली जा रही है। अब अश्लील होली गीत सुनाई देने लगे हैं। पारंपरिक होली गीतों के लुप्त होने का एक प्रमुख कारण मोबाइल है, जिस पर भोजपुरी लोकगीत गीत बजाया जाने लगा है। अब ग्रामीण समाज में प्राचीन पारंपरिक होली गाने वाले पुराने लोग भी नहीं रहे। युवाआें का पारंपरिक होली गीतों से रूझान समाप्त होता जा रहा है।
हलिया ब्लाक के आदिवासी बाहूल्य कोरावल क्षेत्र में आज भी पारंपरिक होली गीत की गूंज यत्र-तत्र सुनाई पड़ती है। मतवार, कुशियरा, नदना, सगरा, उमरिया, मनिगढ़ा आदि गांवों में आज भी आदिवासी समाज के लोग पारंपरिक होली गीत गाया करते हैं। ऐसे में जरूरत इस बात की है कि ग्रामीण परिवेश से लुप्त हो रही प्राचीन लोक संस्कृति को पुनर्जीवित करने के लिए सामाजिक संगठनाें को पहल करनी होगी।