वन व खनिज विभाग तथा प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ही प्राकृतिक सौंदर्य को नष्ट कराने की खेल में शामिल है। इस बात का खुलासा तब हुआ जब लोगों ने लीज स्वीकृति का शासनादेश देखा। जिसमें साफ साफ लिखा है कि जंगल से करीब एक किलोमीटर दूर लीज का पट्टा स्वीकृत करना है। इसके अलावा प्रकृति को जहां किसी प्रकार का नुकसान हो ऐसे स्थानों पर लीज आवंटित नहीं किए जाएं, लेकिन खनन माफिया इन सारे नियमों को ताक पर रखते हुए संबंधित विभागों से मिलीभगत कर लीज का पट्टा जंगल से करीब सौ मीटर की दूरी पर ही स्वीकृत करा ले रहे हैं।
वहीं कुछ ऐसे खनन पट्टाधारक भी हैं जिनकी लीज जंगल के बीच में है। बता दें कि एक लीज का पट्टा स्वीकृत करने के दौरान करीब पांच बिंदुओं पर सघनता से विचार किया जाता है इसके बाद ही लीज आवंटन होता है। लेकिन पिछले 14 वर्षों से लूट खसोट का दौर ऐसा चला कि मिर्जापुर जिले का प्राकृतिक सौंदर्य ही धीरे धीरे समाप्त होने के कगार पर पहुंच गया है। अब न जंगल बचे ना ही पहाड़। ऐसा ही हाल रहा तो कुछ वर्ष बाद इस इलाके में हरियाली की जगह चारों ओर खंडहर नजर आएगा।
इस बर्बादी के पीछे आम लोग नहीं बल्कि सफेदपोश, प्रशासनिक अधिकारी समेत अन्य कुछ विशेष लोग शामिल हैं। जो पर्दे के पीछे से खेल खेलने का काम कर रहे हैं। बता दें कि शासन ने निर्देश दिया है कि जिस जिले में जंगल हो उससे करीब एक किलोमीटर की दूरी पर ही लीज का पट्टा स्वीकृत किया जाए। जहां पर कड़े पत्थर हों वहां किसी भी दशा में ब्लास्टिंग नहीं किया जाए। जिस स्थान पर लीज स्वीकृत हो उसका सीमांकन करा कर बाउंड्रीवाल बनाया जाए ,ताकि खनन के बाद उसमें हुए गड्ढे में कोई इंसान या पशु नहीं गिर पाए। लीज के बाहर बाकायदा एक बोर्ड लगाया जाए। जिसमें लीज स्वीकृति धारक का नाम, उसके स्वीकृति का समय व क्षेत्रफल का आंकड़ा लिखा हो। इतना ही नहीं लीज के किनारे किनारे पौधे लगाएं जाएं जिससे वहां से उड़ने वाली धूल की चपेट में आकर कोई बीमार न हो। साथ ही प्रतिदिन वहां पानी की बौछार किया जाए।