छानबे विधानसभा का नामकरण इस इलाके के विस्तृत रकबे के चलते है। कुल 96 हजार बीघे का यह भूभाग बेहद उपजाऊ है। पर सिंचाई का उचित बंदोबस्त नहीं होने के कारण उतनी उपज किसान नहीं ले पा रहे हैं, जितनी होनी चाहिए। क्षेत्र को ऐसे रहनुमा की तलाश है जो भगीरथ की तरह सिंचाई के लिए कोई गंगा उतार लाए। अफसरों ने कार्ययोजना बनाकर सरकार के पास भेजा भी लेकिन उसे अमली जामा नहीं पहनाया जा सका। इलाके में सिंचाई के बंदोबस्त की मांग हर चुनाव में होती रही है और इस बार भी है।
छानबे विधानसभा क्षेत्र के अकोढ़ी, विरोही, देवरी, महड़ौरा, महुआरी, अरगी सरपत्ती, कौडियरा, रामपुर, भटेवरा, गैपुरा, कलना, गोड़सर सरपत्ती, गोड़सर पांडेय, रैपुरी, विरौरा, तेलियानी, खम्हरिया कला, नौगांव, ऊंचडीह, सुपंथा, तिलई परवा, बबुरा गांवों की मुख्य आर्थिक गतिविधि कृषि है। इन गांवों की अधिकांश भूमि असिंचित है। सिंचाई का बंदोबस्त नहीं होने के कारण इलाके के छानबे हजार बीघा के रकबे में किसान केवल एक फसल ही ले पाते हैं। अधिकांश भाग में चना, मटर, अलसी, सरसों, मसूर की ही खेती हो पाती है।
वर्ष 2008 में सूखा पड़ा तो प्रशासन को इस इलाके की चिंता सताने लगी। तत्कालीन मंडलायुक्त सत्यजीत ठाकुर ने इलाके का निरीक्षण किया और सिंचाई विभाग के अधिकारियों से इलाके में सिंचाई के बंदोबस्त की कार्ययोजना बनवाकर शासन को भेजी भी। मगर प्रभावी पैरवी नहीं हो पाने के कारण इस योजना को अमली जामा नहीं पहनाया जा सका।
किसान गोवर्धन सिंह, सुरेश दूबे, राकेश पांडेय, पन्ना लाल पटेल, शिवचंद्र मिश्र, रमेश सिंह, संतोषधर दूबे, अखिलेश सिंह, मदन मोहन मिश्र आदि का कहना है कि हर बार चुनाव में उम्मीदवार किसानाें की सिंचाई समस्या से निजात दिलाने के वादा करते हैं, लेकिन चुनाव जीतने के बाद भूल जाते हैं। ग्रामीणों ने कहा कि इस बार उसी को मत दिया जाएगा जो किसानाें को सिंचाई समस्या का निजात का कराने का भरोसा दिलाए।