नागपंचमी पर कंतित स्थित नागकुंड पर पूजन-अर्चन करने श्रद्धालु जुटेंगे। मान्यता है कि यहां पर नाग देवता का पूजन करने से मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। देखरेख व संरक्षण के अभाव में ऐतिहासिक नागकुंड अपनी पहचान खोता चला जा रहा है, बावजूद इसके नागकुंड भक्तों के आस्था का केंद्र बना हुआ है।
नागपंचमी को नागकुंड पर बड़ी संख्या में भक्त नाग देवता का पूजन अर्चन करने आते हैं। मान्यता है कि विंध्याचल के त्रिकोण पथ पर पाताल लोक का रास्ता है। पाताल लोक का रास्ता प्राचीन नगरी पंपापुर से था, जो विंध्याचल में है। शास्त्रों में वर्णित है कि पंपापुर नागवंशी राजाआें की राजधानी थी। मां विंध्यवासिनी नागवंशी राजाओं की कुल देवी के रूप में पूजीं जाती थीं। नागकुंड में पांच कुएं हैं।
इस कुंड को बावन घाट की बावली भी कहा जाता है। इसमें चारों दिशाओं से जाने के लिए सीढ़ियां बनी हुई हैं। मान्यता है कि इन सीढ़ियों को नागवंशियों ने बनवाया था और इसी रास्ते से पाताल लोक तक जाते थे। कुंड की गहराई कितनी है, इसको कोई भी नहीं जानता है। कहा यह भी जाता है कि वर्षों पूर्व माता के धाम में आने वाले भक्त इस कुंड से प्रसाद बनाने के लिए जो बर्तन मांगते थे, वह मिल जाता है।
लोग उसका प्रयोग कर उसे वापस कुंड में डाल देते थे। नागवंशी राजाओं की कुल देवी मां विंध्यवासिनी के पूजन की धूपदानी पर नाग के फन की बनी हुई है, जिसे नागवंशीय राजाओं की निशानी माना जाता है। मान्यताओं के चलते नाग पंचमी पर यहां पूजन करने के लिए दूरदराज से लोग आते हैं। मगर रखरखाव के अभाव में बावली की सीड़ियां टूटने लगी हैं। नागपंचमी की तैयारियां चल रही हैं लेकिन पानी में काई जमी हुई है और सीढ़ियों पर घास उगी है।