पड़री। भारत देश को अंग्रेजों की गुलामी आजाद कराने में मिर्जापुर के शहीद नरेश चंद्र श्रीवास्तव ने अपने प्राणों की आहुति दे दी। कक्षा दस में पढ़ते समय ही आजादी की लड़ाई में कूद पड़े। भारत छोड़ो आंदोलन के तहत पहाड़ा स्टेशन को आग के हवाले कर दिया गया। इस दौरान साथी को बचाते हुए बुरी तरह से झुलस गए और अंग्रेजों से बचने में प्राण चले गए। पुलिस उन्हें जिंदा नहीं पकड़ सकी।
नरेश चंद्र श्रीवास्तव का जन्म अपनी ननिहाल भदोही के खमरिया नगर में आठ जुलाई 1924 को हुआ था। पिता रामशंकर लाल श्रीवास्तव और माता किशन देई धर्म प्राण लोग थे। बीएलजे इंटर कालेज में 10वीं की पढ़ाई के दौरान नारघाट के शहीद उद्यान में मौलाना अबुल कलाम आजाद का भाषण सुना और प्रभावित होकर स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े। बच्चों की टोली बना कर गांव-गांव में जाकर लोगों में स्वतंत्रता संग्राम के प्रति जागरूक करते रहे। महात्मा गांधी और पंडित जवाहर लाल नेहरू के विचारों से वे काफी प्रभावित हुए। 14 अगस्त 1942 को गैपुरा में क्रांतिकारियों की बैठक हुई। वहां भारत छोड़े आंदोलन को धार देने का फैसला लिया गया। 17 अगस्त 1942 को बेलवन के पकरी के पुरा के जीतनारायण पांडेय, बबुरा के पुष्करनाथ, बिरौरा के छविनाथ के साथ वे मिर्जापुर-चुनार के बीच पहाड़ी ब्लॉक स्थित पहाड़ा स्टेशन पहुंचे। उन्होंने स्टेशन को फूंक दिया। इस दौरान एक साथी अंदर फंस गया, जिसको बचाने में नरेश बुरी तरह से जल गए। उनको लेकर साथी देवाही गांव में एक गन्ने के खेत में पहुंचे। पुलिस के पहुंचने की जानकारी होने पर साथी रात में नरेश को नाव से लेकर वाराणसी इलाज के लिए ले गए। इलाज के दौरान एक चिकित्सालय में नरेश ने अंतिम सांस ली।
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बखान करते नहीं थकते थे जीत नरायण
पड़री। पहाड़ा स्टेशन को फूंकने में अहम भूमिका निभाने वाले पकरी पुरा गांव के जीत नरायण पांडेय का देहांत बीते दो वर्ष पूर्व हो गया। वह गांव के लोगों केे आजादी के दिनों की कहानी बड़े चाव से सुनाते थे साथ ही वह श्नरेश चंद्र श्रीवास्तव की बहादुरी का बखान करते नहीं थकते थे।