मिर्जापुर। लोकसभा के चुनावी समर में नेता एक-दूसरे पर आरोप प्रत्यरोप की झड़ी लगा रहे हैं। भाजपा के लोग महागठबंधन को महामिलावट कह रहे हैं तो सपा नेता भाजपा को महागिरावट बता रहे हैं। चीलम से लेकर टोटी चुराने तक की बातें पिछले दो दिनों में नेताओं केे भाषण में हो चुकी है। इस समर में जिले के विकास को लेकर कोई चर्चा नहीं कर रहा है। कभी इस जिले का पीतल उद्योग, कालीन उद्योग, चीनी मिट्ट, काष्ठ कला उद्योग, लाह चपड़ा उद्योग देश भर में मशहूर था। इन उद्योग धंधों की हालत आज बेहद खराब है। कुछ का काम तो बंद हो गया और कुछ बंद होने के कगार पर हैं। इन उद्योग धंधों नई संजीवनी की जरूरत है। संजीवनी मिलने से लाखों को रोजगार मिलेगा जिससे उन्हें रोजी रोटी के लिए दूसरे प्रदेशों में नहीं जाना होगा। स्थानीस स्तर के इन मुद्दों को नेता अपने भाषणों में कोई जगह नहीं दे रहे हैं।
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पीतल उद्योग: शहर में बर्तन गलाने को भट्ठियां लगती थी। तब इसके लिए सब्सिडी थी। स्टील के बतर्न सस्ते मिलने लगे तो पीतल पर ग्रहण लगने लगा। मिर्जापुर में बने बर्तन पूरे देश में जाते थे। कम से कम 50 हजार लोग इस धंधे से जुड़े थे। दुर्गादेवी, चौबे टोला, कदमतर, बड़ी माता, बभनहिया टोला, गुदड़ी, घंटा घर, जयराम बगीचा, पक्की सराय, तूले बाबा गली में इसका कारोबार होता था। अब कुछ घरों तक ही ये कारोबार सीमित रह गया है। इस धंधे में पांच सौ रुपये रोज मजदूरी मिलती थी। भट्ठी पर रोजाना छह घंटे का काम होता था।
कालीन उद्योग: यहां हाथ से कालीन बुना जाता था। महंगे दाम पर विदेशों में कालीन बिकता था। कोई ऐसा गांव नहीं था जहां कालीन नहीं बुना जाता था। काठ लगाकर बुनाई होती थी। कालीन में मशीनीकीरण हो गया तो बाजार खत्म हो गया। कम से कम एक लाख इससे जुड़े थे। ये लोग बेकार हो गए। कारोबार घटकर 25 प्रतिशत तक रह गया।
चीनी मिट्टी:चुनार के चीनी मिट्टी के बर्तन देश भर में मशहूर थे। चीनी मिट्टी उत्पादन का केंद्र बना था। यहां कप प्लेट, अचार बनाने वाले जार, गुलदस्ता, खिलौले, बनते था। पूरे देश में यहां का बर्तन जाता था। दस हजार लोग इसमें लगे थे। इसकी जगह अब प्लास्टर आफ पेरिस ने लिया। ये उ्दयेेग दम तोड़ रहा है।
काष्ठ कला उद्योग:अहरौरा-नगर पालिका क्षेत्र में किसी जमाने में विकसित उद्योग था। घर-घर में कौरेया लकड़ी के खिलानै बनाए जाते थे। आज से बीस साल पहले तक विकसित उद्योग था। पांच हजार लोग इससे जुड़े थे। ये उद्योग लगभग खत्म हो चुका है।
लाह चपड़ा उद्योग:शीशम के लकड़ी और अन्य लकड़ी में पेंट के काम में आने वाला लाह चपड़ा उद्योग प्रसिद्ध था। जंगलों की लकड़ी से गोंदनुमा पदार्थ निकाल कर लोग लाते थे और इस्तेमाल लकड़ी पर पेंट के काम में आता था। ये उद्योग भी खत्म हो गया।
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