क्षेत्र के सोनगढा गांव में चल रहे सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा के दूसरे दिन आचार्य रामाश्रय महराज ने कथा के रसपान के महत्व पर प्रकाश डाला। कहा कि कथा को सुनने से प्रेत आत्माएं भी मुक्ति को प्राप्त हो जाती हैं।
उन्होंने कहा कि भगवान शिव पार्वतीजी को कैलाश पर्वत पर त्रिनेत्र खोलकर अमर कथा सुनाने लगें। उसी जगह पर एक तोते का अंडा पड़ा था। इस दौरान अंडा फूट गया और उसमें से बच्चा धीरे-धीरे बड़ा होता गया और वह शिव के अमर कथा को श्रवण करता रहा। कुछ देर बाद पार्वती को नींद लग गई। और तोता हुंकारी भरता गया, जब पार्वती की नींद खुली तब कथा समाप्त हो चुकी थी। तब पार्वतीजी ने कथा के संबंध में पूछा। तो शिव ने कहा हुकार कौन भर रहा था। शिव ने दिव्य चक्षु से देखकर बताया, तो शिव ने त्रिशूल लेकर प्रहार करना चाहा उसी समय ऋषि पत्नी अर्ची के मुख में समाहित हो गए। ऋषि की पत्नी को गर्भवती देखकर शिव ने वापस लौट आए। अर्ची के गर्भ से सुखदेव का जन्म हुआ। जिन्होंने ने कथा की रचना की। शिव ने पार्वती को अमर कथा इसलिए सुनाया की एक बार शिव के अनुपस्थित में नारद कैलाश पर्वत पर जाकर पार्वती से कहा की शिव भगवान सबसे अधिक किससे प्रेम करते हैं। पार्वती ने अपने को बताया। उसके बाद देव ऋषि नारद ने कहा कि शिव के गले में मुंड माला किसकी हैं। यही शिव भोले आपको बता दें तब मैं मान जाऊंगा की आपसे अधिक प्रेम करते हैं। कैलाश पर्वत पर शिव के आने के बाद पार्वती ने पूछा कि आपके गले में माला किसके सर की हैं, तो शिव ने उत्तर दिया कि ये माला हर युग में पार्वती के सर की हैं। इतने में पार्वती जी डर गई और शिव से प्रार्थना किया की अब ऐसा आप नहीं करें तब भगवान शिव ने पार्वती को अमर नाथ की गुफा में अमर कथा सुनाई। इस दौरान राजेंद्र सिंह, भगवती प्रसाद दुबे, तेजमुनि सिंह, शिवबहादुर सिंह, जयप्रताप सिंह, संतोष सिंह, सतेंद्र सिंह आदि उपस्थित रहे।