मिर्जापुर। विकास खंड सिटी के मझिगवां भटौली में हुई कृषि संगोष्ठी में जैव उर्वरक के बारे में बताया गया। काशी हिंदू विश्वविद्यालय के मुख्य अन्वेषक व सहायक प्रोफेसर जेपी वर्मा ने बताया कि जैव उर्वरक रासायनिक खाद के पूरक हैं। इनके इस्तेमाल से बेहतर परिणाम प्राप्त हो सकते हैं। किसानों को मृदा की जांच कराकर उसी के अनुसार खाद डालना चाहिए। इस मौके पर तरल जैव उर्वरक और ट्राइकोडर्मा के बनाने की विधि सिखाई गई।
उन्होंने कहा कि जैव उर्वरक का प्रयोग बीज उपचार, पौध जड़ उपचार, कंद उपचार एवं मृदा उपचार विधि से करते है। बीज उपचार श्रेष्ठ विधि है। इस जैव उर्वरक से उत्पादन में वृद्घि, खाने में गुणवत्ता में वृद्घि, मिट्टी की उपजाऊ शक्ति में वृद्घि और रासायनिक उर्वरक से सस्ता पड़ता है। जैव उर्वरक डालने से उत्पादन में 20 से 30 प्रतिशत उत्पादन में वृद्घि होता है। किसानों को जैव उर्वरक देकर उनके यहां गेहूं, धान, चना, मुंग, अरहर, और सब्जियों की फसलों पर प्रयोग कराया गया। इस दौरान दुर्गेश कुमार जायसवाल, ओनंद कुमार गौरव, गोवर्धन कुमार चौहान सहित रिसर्च टीम ने मिट्टी का नमूना लिया। जिससे मिट्टी के गुणों और उनकी कमियों की जांच की जा सके। बता दें कि काशी हिंदू विश्वविद्यालय के पर्यावरण एवं धारणीय विकास संस्थान में जैव उर्वरकके विषय पर शोध कार्य चल रहा है। इसी के तहत किसानों को जैविक खाद का महत्व और उसके उपयोग के बारे में बताया जा रहा है। इस दौरान हृदय लाल, रामचंदर, अनंता, झुन्ना, जवाहिर, झुम्मक, छोटेलाल, सिपाही लाल, खुशियाल, सुनील, राजाराम, लालजी, ननही, रविंद्र, रमाशंकर, छविनाथ, सियाराम, हीरालाल, कलंदर, अनिल, श्याम लाल आदि शामिल रहे। इसी क्रम में विकास खंड कोन के उसैनीपुर चील्ह में भी किसान संगोष्ठी का आयोजन किया गया। जिसमें किसानों को जैविक उर्वरक का महत्व बताया।