फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

प्रतीक्षा में जो आनंद है वह प्राप्ति में नहीं

विज्ञापन
विज्ञापन
विन्ध्याचल । शारदीय नवरात्र की नवमी पर श्री देवी मानस कथा के अंतिम दिन इलाहाबाद मिर्जापुर रोड पर कालीखोह मोड़ पर संत मुरारी बापू ने राम भरत संवाद की व्याख्या करते हुए कहा कि सत्ता का आदमी नहीं हूं मैं पादुका का आदमी हूं। इंसान को सत्ता का प्रेमी नहीं बल्कि पादुका का प्रेमी होना चाहिए शरणागति से दोनों और प्रेम बढ़ता है।
विज्ञापन

उन्होंने कहा कि कृष्ण को पाने के लिए जो आनंद प्राप्त होता है वह मिलने के बाद समाप्त हो जाता है। मीरा करती हैं श्रीकृष्ण को पाने के लिए जो तड़प कर रही हैं वह मिलने के बाद रहे या न रहे, प्रश्नचिन्ह है। यदि आप अच्छे से रहिए तो मंगल ग्रह पर जाने की आवश्यकता नहीं रहेगी। कहा कि सबरी ,सती अहिल्या, जटायु रावण, भरत यह सभी लोग प्रतीक्षा के उदाहरण हो सकते हैं। इंसान को सत्ता प्रेमी नहीं बल्कि पादुका प्रेमी बनना चाहिए शरणागत से दोनों ओर प्रेम पलता है इसलिए मैं प्रभु के शरणागत होना चाहिए जिस प्रकार से अर्जुन श्रीकृष्ण के शरणागत हुए। बापू ने कहा कि बलि का अर्थ है समर्पण और जब से कोई भक्त अपने इष्ट को समर्पण ना करें वह खुशी नहीं होती शबरी ने भी राम को पाने के लिए कुसंग का बलिदान दिया। बलि को समर्पण का नाम दें हत्या नहीं। बापू ने कहा कि जीएसटी कबूल कीजिए जी का अर्थ गुरु ,एस का अर्थ संत और टी का अर्थ त्रिभुवन बताया अर्थात गुरु संत और त्रिभुवन को अपनाना चाहिए। कथा के अंत में उन्होंने सब जगतगुरु शंकराचार्य के सौंदर्यलहरी के शब्दों में प्रार्थना याचना की जल्पम को जप से क्षमा प्रार्थना किया।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें