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सालों पुराने कोटेदार दुकान कर रहे सरेंडर

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मेरठ। सरकारी सस्ते गल्ले की दुकान पाने के लिए कुछ साल पहले तक लोग बड़ी-बड़ी सिफारिश लेकर आते थे, लेकिन आज हालात विपरीत है। बीते कुछ माह में दर्जनों आवेदन दुकान सरेंडर करने के आ गए हैं। इससे विभाग में खलबली मची है। कोटेदार दुकान सरेंडर करने की चाहे जो वजह बता रहे हों, लेकिन इसके पीछे सार्वजनिक वितरण प्रणाली में बरती जा रही पारदर्शिता को बड़ा कारण माना जा रहा है।
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जिले में सरकारी सस्ते गल्ले की 930 दुकानें हैं। यहां से करीब 4.96 लाख कार्डधारकों को हर माह राशन बांटा जाता है। एक समय राशन दुकानों के आवंटन के लिए गोली तक चल जाया करती थी, लेकिन अब जनपद में हालात बदल रहे हैं। सालों पुराने कोटेदार भी दुकान सरेंडर कर रहे हैं। विभागीय सूत्रों की मानें तो एक माह में 20 से ज्यादा आवेदन दुकान सरेंडर के आ चुके हैं। कुछ ने स्थाई वेतन की मांग की है तो कुछ ने बीमारी और उम्रदराज होने का हवाला दिया है। वहीं अधिकारियों ने शासन की व्यवस्था के अनुरूप इन कोटेदारों को सहायक रखने की लिखित अनुमति का भरोसा दिलाया है। इसके बाद भी वह गल्ला संभालने को तैयार नहीं हैं।
वितरण में पारदर्शिता ने उड़ाई नींद
सार्वजनिक वितरण प्रणाली में बीते दो सालों में खासी पारदर्शिता आई है। इससे कोटा संचालक परेशान हैं। ई-पॉश मशीन आने से कोटेदारों की जिम्मेदारी बढ़ गई है। कहीं न कहीं मुनाफा भी घट गया है। पूर्व में कोटेदार राशन कालाबाजारी कर मुनाफा कमाते थे, लेकिन अब ऐसा कर पाना मुश्किल हो रहा है। कार्डधारकों में भी जागरूकता बढ़ी है।
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वर्जन-
कुछ कोटेदारों ने असमर्थता दर्शाते हुए दुकान सरेंडर करने का आवेदन किया है। बीच सेशन में अगर दुकान बंद होती है तो गरीब परिवारों को नुकसान होगा। फिलहाल इन कोटेदारों को समझाने की कोशिश की जा रही है। -नीरज सिंह, जिला पूर्ति अधिकारी
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