चिंता यह भी जताई गई है कि यदि घर की चिरैय्या पर गौर नहीं किया गया तो वह दिन दूर नहीं जब यह किताबों तक सिमट कर रह जाएगी। बीते कुछ वर्ष से गौरैया को बचाने को लेकर कुछ लोग जागरूक हुए हैं और अपनी छतों पर दाना और पानी रख रहे हैं। इसके अलावा लकड़ी से बने घोंसले भी अपने मकानों में लटका रहे हैं।
गौरैया के विलुप्त होने के प्रमुख कारण
आधुनिक बनावट वाले मकानों में गौरैया को अब घोंसले बनाने की जगह ही नहीं मिलती। इससे उसके जन्मे-अजन्मे बच्चे बाहर बिल्ली, कौए, चील, बाज के शिकार बनते हैं। गौरैया छोटे पेड़ों या झाड़ियों में भी घोंसला बनाती हैं, लेकिन मनुष्य उन्हें भी काटता-छांटता जा रहा है।
बबूल, कनेर, नींबू, अमरूद, अनार, मेहंदी, बांस, चांदनी आदि पेड़ों को पसंद करती है पर ये पेड़ भी अब कम होते जा रहे हैं। शहरों और गांवों में बड़ी तादाद में लगे मोबाइल फोन के टॉवर भी गौरैया समेत दूसरे पक्षियों के लिए बड़ा खतरा बने हुए हैं। इनसे निकलने वाली इलेक्ट्रोमैग्नेटिक किरणें उनकी प्रजनन क्षमता पर बुरा प्रभाव डालती हैं।
गौरैया कृषि और पर्यावरण के लिए फायदेमंद
पर्यावरण को बेहतर बनाने में गौरैया का बड़ा योगदान है। गौरैया अपने बच्चों को अल्फा और कटवर्म नामक कीड़े भी खिलाती है, जो हमारी फसलों के लिए हानिकारक होते हैं। प्रकृति की सभी रचनाएं कहीं न कहीं प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से एक-दूसरे पर निर्भर हैं और हम भी उनमें शामिल हैं। विश्व भर में गौरैया की 26 प्रजातियां पाई जाती हैं, जिनमें से 5 भारत में देखने को मिलती हैं।