काली नदी के किनारे बसे गांव कैंसर की गिरफ्त में हैं। तेजी से मरीजों की संख्या बढ़ती जा रही है। इलाज के नाम पर सरकार के पास कुछ खास नहीं है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के तीन मंडलों के लोगों के लिए महज अकेला लाला लाजपत राय मेमोरियल मेडिकल कॉलेज है। यहां पर कहने को रेडियोथैरेपी की सुविधा है, लेकिन वेटिंग काफी लंबी है। चिकित्सक के पास भी समय नहीं है।
जिले में करीब चार दर्जन से अधिक गांव कैंसर की चपेट में हैं। काली नदी के किनारे वाले सैनी, उलखपुर, जलालपुर, मैथना, इकलौता, पबला, नगला सेखू, कस्तला की स्थिति बहुत खतरनाक है। स्थानीय लोगों की तरफ से लगातार शिकायतें की जा रही हैं, लेकिन शासन और प्रशासन न तो शुद्ध पानी उपलब्ध करा पाया है और न ही उनके इलाज के लिए व्यापक स्तर पर व्यवस्था की गई है।
जांच रिपोर्ट में साफ हो चुका है कि पानी दूषित है जिसकी वजह से लोग बीमार पड़ रहे हैं। वहीं मेडिकल कॉलेज के चिकित्सक को कॉलेज प्रशासन ने सीएमएस का अतिरिक्त चार्ज सौंप दिया है। जिस कारण उनके पास मरीजों को देखने का समय ही नहीं है।
महंगा इलाज हर किसी के बस में नहीं
यूं तो कैंसर के पीछे दूषित पानी के साथ बीड़ी सिगरेट, पान, मसाला से लेकर अन्य नसीले पदार्थों के सेवन को जिम्मेदार माना जाता है, लेकिन सबसे ज्यादा मामले गले के कैंसर के हैं। इसके बाद फेफड़े और लीवर के कैंसर का नंबर आता है। स्तन कैंसर के मामले में भी तेजी से बढ़ रहे हैं।
कैंसर का इलाज हर कोई व्यक्ति नहीं करा सकता है। करीब 4 से आठ लाख रुपये का खर्च कैंसर के ट्रीटमेंट पर आता है। वो अभी अगर शुरुआत की दो स्टेज में ही कैंसर का पता चल जाए। हर मरीज कैंसर का इलाज नहीं कर सकता है।