इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा मदरसों में राष्ट्रगान में छूट दिए जाने वाली याचिका को खारिज किए जाने के मामले में देवबंदी उलमा का कहना है कि जो मदरसे सरकारी अनुदान पर चलते हैं उनके लिए सरकारी फरमान मानना मजबूरी है, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि सरकार अपने फैसले को मदरसों पर जबरदस्ती क्यों थोप रही है।
बुधवार को फतवा ऑनलाइन के चेयरमैन मौलाना मुफ्ती अरशद फारुकी ने इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा मदरसों में राष्ट्रगान वाली याचिका खारिज किए जाने के मुद्दे पर कहा कि भारत एक लोकतांत्रिक देश हैं यहां सबको अपने अपने धर्म के मुताबिक जिंदगी जीने का अधिकार प्राप्त है और हर व्यक्ति अपनी मर्जी का मालिक है। यह बात समझ से परे है कि सरकार मदरसों पर राष्ट्रगान गाने के लिए दबाव क्यों बना रही है। यह जबरदस्ती फैसले को थोपे जाने वाला काम है। मुफ्ती अरशद ने सवाल किया कि क्या मुल्क की तरक्की के लिए यही सब चीजें रह गई हैं। साथ ही कहा कि सरकारी मदद लेने वाले मदरसा संचालकों को चाहिए कि वह मिल बैठकर इस मसले का हल निकालें।
मदरसा जामिया इस्लामिया के वरिष्ठ उस्ताद मौलाना मुफ्ती तारिक कासमी का कहना है कि मदरसों में राष्ट्रगान गाने से राष्ट्रभक्ति साबित नहीं होती। इस्लाम खुद वतन से मोहब्बत करना का संदेश देता है, लेकिन अगर कोई चीज इस्लाम से टकराती है तो उसे जायज कैसे कहा जा सकता है। उन्होंने कहा कि मुस्लिम समाज में सुबह की प्रार्थना फर्ज की नमाज होती है। जो सभी मुसलमान अदा करते हैं, जबकि इस प्रकार की प्रार्थना स्कूलों में होती है। उन्होंने भी कहा कि मदरसों पर सरकार राष्ट्रगान गाने का फैसला जबरदस्ती थोप रही है।
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