कारगिल के पहाड़ों की चोटी भारतीय सेना के अदम्य साहस की गवाह है। 18 हजार फुट की ऊंचाई पर चढ़कर दुश्मन को नेस्तनाबूद करना दुनिया का सबसे जटिल काम था। हिंद की सेना ने इसको अंजाम दिया। रात में पहाड़ों की चढ़ाई चढ़ना और दिन में दुश्मन की निगाह से बचना। सीमित हथियार और खाद्य पदार्थ के साथ जुनूनी सैनिक कारगिल में दाखिल हुए। उनको नहीं पता था कि दुश्मन की तैयारी कैसी है। कितने आधुनिक हथियार उनके पास हैं। दुश्मन का पत्थर भी किसी हथियार से कम नहीं था। ऐसे हालात में सेना ने 26 जुलाई 1999 में कारगिल से पाकिस्तान के सैनिकों को खदेड़ा था।
दुनिया का यूनीक ऑपरेशन था कारगिल
रिटायर लेफ्टिनेंट जनरल आरएन सिंह कारगिल के ऑपरेशन मूवमेंट के महानिदेशक थे। उनकी निगरानी और मैनेजमेंट में कारगिल की जंग हुई। लेफ्टिनेंट आरएन सिंह के मुताबिक इतनी ऊंचाई पर दुनिया की किसी फौज ने लड़ाई नहीं लड़ी। हमने लड़ी भी और जीती भी। दुश्मन गुपचुप ढंग से जाकर बैठ गया था। रणनीति के लिहाज से उसकी शानदार लोकेशन थी। दिक्कत यह थी कि पहाड़ से होते हुए जाने का एक ही रास्ता था। बोफोर्स तोप ऊपर जा नहीं सकती थी। उस पर हर पल दुश्मन की नजर थी। पाकिस्तान सेना ने बेनजीर भुट्टो के कार्यकाल में भी कारगिल की चोटी पर घुसपैठ करने का प्लान बनाया था। लेकिन वह समझदार नेता थी। उसे पता था कि अगर घुसपैठ करके अंदर घुस भी गए तो भारतीय सेना पीछे खदेड़ देगी। जब पीछे आना ही है तो आगे क्यों जाएं। जनरल मुशर्रफ और नवाज शरीक के कार्यकाल में कारगिल हुआ। इस बात के इनपुट हैं कि जनरल मुशर्रफ ने कारगिल का प्लान नवाज शरीफ को नहीं बताया था।
विजय दिवस पर आज कार्यक्रम
भारतीय सेना ने पाकिस्तानी सैनिकों को खदेड़ा था
कारगिल विजय दिवस पर आज पश्चिमी यूपी सब एरिया हेडक्वार्टर शहीदों को श्रद्धांजलि देने के लिए कार्यक्रम आयोजित करेगा। जीओसी मेजर जनरल के. मनमीत सिंह वीर नारियों का सम्मान करेंगे। आरवीसी में भंडारी हॉल में कार्यक्रम का आयोजन होगा। पाइन डिविजन में सुबह साढ़े नौ बजे शहीदों को श्रद्धांजलि दी जाएगी।
बॉडी ट्यून करने के लिए रुकते थे जवान
रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल आरएन सिंह का कहना है कि 18-20 हजार फुट की ऊंचाई पर चढ़ने के लिए शरीर को उस तापमान और माहौल में कुछ समय रखकर बॉडी ट्यून करनी पड़ती है। नौ हजार फुट की चढ़ाई चढ़ने के बाद सात दिन तक वहां रहना होता है। तब शरीर ढलता है। उसके बाद 12 हजार फुट पर जाने के बाद चार दिन वहां रुकना पड़ता है। इस तरह 15 से 20 दिन लगते हैं। सेना ने इससे भी कम समय में चढ़ाई चढ़ी। जवानों और अधिकारियों की बदौलत जंग जीती गई। उनका जज्बा कारगिल की चोटियों से भी ऊंचा था। मौत के खौफ को उन्होंने पीछे छोड़ दिया था।
पश्चिमी उप्र के ये जवान हुए शहीद
मेजर मनोज तलवार (वीर चक्र से अलंकृत), सीएचएम यशवीर सिंह (सेना मेडल से अलंकृत), नायक सत्यपाल सिंह, ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव, नायक हरविंद्र सिंह, 22 ग्रेनेडियर से जुबेर अहमद हैं।
मेरठ में तैनात जांबाज बटालियन
कारगिल युद्ध में दुश्मन के दांत खट्टे करने वाली 17 गढ़वाल राइफल्स वर्तमान में मेरठ में तैनात है। हाल में उन्होंने अपना स्थापना दिवस मनाया था। जिसमें कारगिल युद्ध लड़ने वाले रिटायर अधिकारी और जवान शामिल हुए। अपने शहीदों को श्रद्धांजलि दी। 18 गढ़वाल बटालियन का भी उल्लेखनीय योगदान रहा है। इसके अलावा 17 जाट रेजीमेंट ने भी शानदार योगदान दिया। पिछले दिनों 17 जाट रेजीमेंट मेरठ से गई है। 18 गढ़वाल रेजीमेंट आने वाली है।
ऊंचाई की लड़ाई में नहीं खाएंगे मात
भारतीय सेना
कारगिल की ऊंचाई पर लड़ाई लड़ने के बाद सेना मात नहीं खाएगी। अनुभव और अतीत से सबक लेते हुए सेना ने इसकी तैयारी कर ली है। हिमालय से लगा बॉर्डर पाकिस्तान का हो या चीन का। कारगिल में जवानों ने खुद जाकर दुश्मन के बंकर तोड़े। अब वायुसेना की मदद से वह तोड़े जा सकते हैं। तब से अब तक एयरफोर्स में काफी मजबूती आई है।
‘बेटे की शहादत पर गर्व, यही देती है मुझे शक्ति’
गंगानगर/मेरठ। कारगिल में शहीद हुए बेटे की याद मुझे गर्व महसूस कराती है। मुझे जीवन जीने की शक्ति प्रदान करती है। यह कहना है कि शहीद मेजर मनोज तलवार के पिता कैप्टन (रिटायर्ड) पीएल तलवार का। बेटे की शहादत के बारे में जिक्र करते हुए वे बताते हैं कि सियाचिन की 19 हजार फीट ऊंची पहाड़ी की चोटी पर मेजर मनोज ने अपने साथियों के साथ दुश्मनों को मुंहतोड़ जवाब देकर विजयी पताका फहराई थी। उसी पल दुश्मन की गोली सीने पर खाकर मनोज शहीद हुए थे। वह शहादत का दिन 13 जून 1999 था। अब उस चोटी को तलवार पीक के नाम से जाना जाता है।
चीन और पाक नहीं हो सकते कभी मित्र
अपने कर्तव्य को धर्म मानने वाले पीएल तलवार कहते हैं कि अब जिलाधिकारी शहीदों के परिवारों पर ध्यान नहीं देते। राज्य सरकार से मिलने वाली पांच हजार रुपये की पेंशन भी अब सम्मान योग्य हो जानी चाहिए। उनका कहना है कि पाकिस्तान और चीन कभी भी भारत के मित्र नहीं हो सकते। दुश्मन हमेशा हमले को तैयार रहता है जबकि हम बातचीत करना चाहते हैं। देश में चीनी सामान और कंपनियों को प्रतिबंधित कर देना चाहिए। शहीदों के परिवार के प्रति आमजन में सम्मान पैदा होना चाहिए। प्रत्येक परिवार बच्चों को फौज में जाने की प्रेरणा दे।
17 दुश्मनों को मारकर प्राण किए थे न्यौछावर
हस्तिनापुर। ग्राम पाली निवासी योगेंद्र यादव टाइगर चोटी पर 17 पाक सैनिकों को ढेर कर पांच जुलाई 1999 को शहीद हो गए थे। उनका परिवार आज भी देश की रक्षा के लिए अपने प्राण देने से पीछे नहीं रहना चाहता। लेकिन अफसोस है कि राजनीतिक लोग योगेंद्र की याद में शहीद स्मारक और हस्तिनापुर को जोड़ने वाला मुख्य द्वार बनवाने का वादा भूल गए। योगेंद्र के छोटे भाई महीपाल सेना की डेजिडियर बटालियन में तैनात हैं। परिवार में योगेंद्र की पत्नी उर्मिला, दो पुत्र और एक पुत्री है। आज कारगिल दिवस पर सैफपुर कर्मचंदपुर मार्ग पर स्थित उनकी प्रतिमा पर श्रद्धांजलि कार्यक्रम का आयोजन होगा।
मुफलिसी में जी रहे कारगिल शहीद के माता-पिता
शहीद के माता-पिता
कारगिल की लड़ाई में दुश्मनों के दांत खट्टे करते हुए खुशी-खुशी अपने प्राण न्यौछावर करने वाले शहीद राजेश वैरागी का नाम इतिहास में दर्ज हो गया। मगर, सरकारी लापरवाही के चलते उनके परिजनों को कहीं का नहीं छोड़ा। शहादत के वक्त किए गए सभी वायदे धूल में मिल चुके हैं। माता पिता के बुढ़ापे की लाठी राजेश तो शहीद हो गए और उनके मां-बाप मुफलिसी में जीवन जी रहे हैं।
18 साल पहले गंगोह के बस अड्डा चौक पर लगने वाली शहीद की प्रतिमा को प्रशासन वादा कर भूल गया। एक सड़क का नाम जरूर शहीद को समर्पित किया गया था, मगर समय बीतने के साथ ही उस पर शिलापट का कोई नामो-निशान तक नहीं है।
गंगोह से करीब नौ किलोमीटर दूर गांव जेहरा निवासी लांस नायक राजेश वैरागी 1999 में पाकिस्तान से हुई कारगिल की लड़ाई में वीरगति को प्राप्त हो गए थे। लांस नायक शहीद राजेश वैरागी के अंतिम संस्कार के मौके पर जिला प्रशासन ने गंगोह के सहारनपुर बस अड्डा चौक पर शहीद की प्रतिमा लगाने की घोषणा की थी।
समय से नहीं आती पेंशन
शहीद को श्रद्धांजलि
यह घोषणा पूरी करना तो छोड़िए शहीद के नाम पर गंगोह-वजीरपुर मार्ग का नामकरण कर शिलापट लगाया गया था। जो थोड़े समय बाद गायब हो गया। शहीद की मां कांति देवी के चेहरे पर झुर्रियां पड़ गई हैं। अपने बेटे की शहादत को याद कर वे गौरवान्वित भी होती हैं। करीब 75 वर्ष की कांति देवी सरकार को कोसती हैं और कहती हैं कि बेटे की शहादत देश के लिए हुई और अफसरों ने उस वक्त बड़ी-बड़ी बातें की थी। मगर दुख इस बात का है कि इन अफसरों ने बेटे की शहादत का मोल तक नहीं समझा। सरकार भी चली गई और दूसरी आई, मगर किसी ने शहीद के सम्मान के बारे में नहीं सोचा। अब इन सरकारों पर यकीन नहीं है, बस भरोसा भगवान का है कि वे ही न्याय करेंगे।
शहीद राजेश वैरागी की पत्नी तो मजबूरी में हरियाणा चली गई थी और गांव में उसके पिता ताराचंद, मां कांति देवी और एक भाई राकेश वैरागी रहते हैं। इनके पास महज 10 बीघा जमीन है और यही उनकी आजीविका का साधन है। मां-बाप को सरकार की ओर से ढाई-ढाई हजार रुपये पेंशन मिलती है, मगर वह भी समय से नहीं आती। पिता ताराचंद कहते हैं कि बेटे की शहादत पर गर्व है, मगर सरकार और अफसरों ने जो किया उसे कभी माफ नहीं करूंगा। यह शहीद के परिजनों का सम्मान छोड़िए उनकी सुध तक नहीं लेते।
सांसद राघव लखनपाल शर्मा का कहना है कि यह मुद्दा वाकई बेहद गंभीर है और शहीद का सम्मान हमारे के लिए गौरव है। शहीद के परिजनों से किए गए हर वायदे को पूरा कराया जाएगा। इसके लिए मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री को अवगत कराया जाएगा।
वायुसेना परिसर में आज मनेगा कारगिल विजय दिवस
शहीद राजेश वैरागी
सरसावा। पाकिस्तान द्वारा हिंदुस्तान की भूमि पर जबरदस्ती कब्जा करने की नीयत से वर्ष 1999 में थोपे गए कारगिल युद्ध का विजय दिवस 26 जुलाई को मनाया जा रहा है।
कारगिल युद्ध के दौरान 28 मई सन 1999 को सरसावा वायुसेना स्टेशन पर तैनात चार अधिकारी स्क्वाड्रन लीडर राजीव पुंडीर, फ्लाईट लेफ्टिनेंट टीएस मुहिलान सार्जेंट पीवीएनआर प्रसाद तथा सार्जेंट आरके साहू युद्धक हेलीकॉप्टर एमआई-17 में लगी मशीनगनों से दुश्मनों पर गोलाबारी करते हुये थल सेना को रसद पहुंचा रहे थे कि तभी दुश्मन की ओर से मिसाइल अटैक हुआ। इसमें सवार वायुसेना के सभी अधिकारी सैनिक जीवन के सबसे बड़े सम्मान वीरगति को प्राप्त होकर भारतीय इतिहास में सदा के लिए अमर हो गए। इन्हीं रणबांकुरों की याद में वायुसेना स्टेशन में एक युद्ध स्मारक का निर्माण कराया गया। जहां प्रतिवर्ष 28 मई को शहीद दिवस मनाया जाता है। वीरता की कड़ी में देवबंद क्षेत्र का सैनिक जयद्रथ भी अपना नाम अंकित करा गया। सहारनपुर का हर नागरिक नमन करता है और करता रहेगा।
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