12 मीटर चौड़े और पांच किलोमीटर लंबे मेरठ माइनर का इतिहास जनता की जुबां पर तो है। लेकिन धरातल पर माइनर गायब हो चुका है। इतना ही नहीं सिंचाई विभाग में भी माइनर का रिकॉर्ड नहीं मिल रहा है।
जिससे साफ हो रहा है कि माइनर 25 साल पहले सिंचाई विभाग के ही अधिकारियों ने प्राइवेट बिल्डरों से साठगांठ करके चीरहरण के लिए सौंप दिया था। जहां बिल्डर ने माइनर पर सड़क बना दी। वहीं पटरी को कॉलोनियों में शामिल कर दिया गया। अब तो माइनर पर बनी सड़क को भी कॉलोनियों के नाम से ही जाना जाता है।
फाइल खंगाल रहे हैं, जरूर मिलेगा रिकॉर्ड
सिंचाई विभाग के अधिशासी अभियंता आशुतोष सारस्वत का कहना है कि मेरठ माइनर था, यह तो साफ हो गया है। 30-40 साल पुराना रिकॉर्ड है। उसे तलाश किया जा रहा है। उस समय के अधिकारियों और कर्मचारियों के रिटायर होने के कारण रिकॉर्ड मिलने में दिक्कत आ रही है।
फिर भी ऐसा नहीं है कि रिकॉर्ड नहीं मिलेगा। सभी संबंधित अधिकारी व कर्मचारियों को जिम्मेदारी दी गई है। एक सप्ताह के भीतर पूरी स्थिति स्पष्ट हो जाएगी। मेरठ माइनर की फाइल मिलने के बाद ही आगे की कार्रवाई तय की जाएगी।
माइनर के साथ ही तो नष्ट नहीं कर दिया रिकॉर्ड
अमर उजाला में मेरठ माइनर का इतिहास उजागर होने के बाद सोमवार को सिंचाई विभाग के अधिशासी अभियंता आशुतोष सारस्वत के कार्यालय में सभी अधिकारियों की बैठक हुई। सभी लिपिकों को साथ लेकर माइनर के रिकॉर्ड की तलाश में जुटे रहे।
नक्शा विभाग और रिकॉर्ड रूम में रखी अलमारियों को खंगाला गया। शाम तक चली मशक्कत में अधिकारियों को सफलता हाथ नहीं लगी। जिससे यह भी आशंका जताई जा रही है कि कहीं उस समय विभाग के अधिकारियों ने माइनर के साथ सरकारी भूमि के अभिलेख भी तो गायब नहीं कर दिए।