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कबाड़ में तब्दील 2 करोड़ के वेंटिलेटर, स्टेटस रिपोर्ट जानकर हर जाएंगे दंग

Wed, 05 Apr 2017 01:48 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो/ मेरठ
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फाइल फोटो - फोटो : अमर उजाला
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मेडिकल कॉलेज में मरीज इलाज के लिए भटकते रहे और कॉलेज प्रशासन संसाधन न होने का रोना रोता रहा। लेकिन करीब 10-12 साल में कई बदलावों के बीच करोड़ों रुपये के उपकरण धूल फांकते रहे। क्योंकि उनका कोई इस्तेमाल ही नहीं हुआ। कुछ उपकरणों की पैकिंग तक नहीं खुली तो चूहों ने उनकी वायर तक कुतर डाली। नतीजा यह रहा कि 12 वेंटिलेटर कबाड़ में तब्दील होकर रह गए, जिनका मरीजों के लिए कोई इस्तेमाल नहीं हुआ। अगर हुआ भी तो महज रस्म अदायगी के लिए। अब सरकार बदली तो समीक्षा के दौरान वेंटिलेटर का मुद्दा उठाया गया, जिसकी स्टेटस रिपोर्ट देखकर हर कोई दंग रह गया।
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सरकार द्वारा मुहैया कराए गए करीब दो करोड़ रुपये के वेंटिलेटर कबाड़ में तब्दील होने का मामला मेडिकल कॉलेज प्रशासन दबाता रहा। लेकिन मुख्यालय ने जब हर वेंटिलेटर की यूजिंग रिपोर्ट मांगी तो हकीकत चौंकाने वाली सामने आई। अब कॉलेज प्रशासन यह कहकर कन्नी काट रहा है कि इनका इस्तेमाल कुछ दिनों के लिए हुआ था। लेकिन बाद में अचानक से गड़बड़ी आई। लेकिन कंपनी ने रिपेयर की सुविधा नहीं दी। ऐसी स्थिति में इन वेंटिलेटर का इस्तेमाल नहीं किया जा सका। कॉलेज की नीयत पर सवाल कई नजरियों से खड़ा होता है। आखिरकार सारे वेंटिलेटर एक साथ ही कैसे खराब हो गए। अगर वेंटिलेटर खराब थे और कंपनी ने रिपेयर करने से इंकार कर दिया था तो फिर कॉलेज प्रशासन ने शासन से रिपेयर कराने के लिए अलग से बजट क्यों नहीं मांगा।

चार वेंटिलेटर की नहीं खुली पैकिंग
साल 2009 में डॉ. संदीप मित्तल के प्राचार्य रहते हुए यूपी सरकार ने चार वेंटिलेटर मुहैया कराए थे। उस वक्त स्वाइन फ्लू फैला था। जिसके मद्देनजर प्रदेश के चुनिंदा मेडिकल कॉलेजों को वेंटिलेटर दिए गए थे। कॉलेज प्रशासन तर्क देता है कि इर्टिका कंपनी के वेंटिलेटर का प्रयोग कुछ समय ही हो पाया। क्योंकि उनमें उसके बाद खराबी आनी शुरू हो गई। लेकिन सूत्र बताते हैं कि इनका इस्तेमाल ही नहीं किया गया। बसपा सरकार में दिए गए वेंटिलेटर से जनता को कितना लाभ पहुंचा। कितने मरीजों को वेंटिलेटर पर भर्ती किया गया, इसको लेकर करीब ढाई साल पहले शासन ने जानकारी मांगी। उस वक्त डॉ. प्रदीप भारती गुप्ता प्राचार्य थे। अब तैयार की गई रिपोर्ट पर तत्कालीन सीएमएस ने हस्ताक्षर करने से इंकार कर दिया। क्योंकि वेंटिलेटर खोलकर लगाए ही नहीं गए थे। उस वक्त खुलासा हुआ था कि वेंटिलेटर की वायर चूहे काट चुके हैं और अब वो चलने की हालत में ही नहीं हैं।  
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क्या है मेडिकल का तर्क
एनेस्थीसिया विभागाध्यक्ष और ट्रॉमा सेंटर के नोडल अधिकारी डॉ. सुभाष दहिया का कहना है कि रिपोर्ट मेरी तरफ से ही तैयार की गई थी। खराब पड़े 12 वेंटिलेटर सरकार ने अलग-अलग साल में मुहैया कराए थे। जबकि साल 2009 में मुहैया कराए गए चारों वेंटिलेटरों की क्वालिटी बेहद खराब थी, जिस कारण से उनका इस्तेमाल नहीं हो सका। हालांकि उन्हें कुछ दिनों के लिए चलाया जरूर गया था।
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