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विरोधियों को कच्चा समझ गच्चा खा गए थे जाट, इसलिए इस बार पार्टियां...

Sun, 08 Jan 2017 05:38 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो, मेरठ
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फाइल फोटो - फोटो : अमर उजाला
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वेस्ट यूपी की बड़ी ताकत कहे जाने वाले जाट वोटर पिछले विधानसभा चुनाव में गच्चा खा गए थे। जाट वोट बंटने का नतीजा यह रहा कि बड़ी संख्या में जाट प्रत्याशी चुनावी रण में शिकस्त खा गए। हालांकि, कई अहम सीटों पर जाट प्रत्याशी मैदान में ही नहीं उतर पाए थे, क्योंकि मुख्य दलों से उन्हें टिकट ही नहीं मिला। वहीं कुछ सीटों पर जाट प्रत्याशियों ने ही जाटों को हराया। इस बार जहां जाट अपनी चुनावी रणनीति को लेकर सजग दिख रहे हैं तो पार्टियां भी जाट के सामने जाट उतारने से बच रही हैं।
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विधानसभा चुनाव-2017 का शंखनाद हो चुका है। सभी सियासी दलों ने अपने-अपने हिसाब से चालें चलनी शुरू कर दी हैं। वेस्ट यूपी में यूं तो गुर्जर, यादव, जाट और मुस्लिम समीकरण सियासी तस्वीर बदलते आए हैं। लेकिन, पिछले चुनाव में कई समीकरण बदल गए थे। यहां की सियासत में अहम भूमिका निभाने वाले जाट वोटर खुद ही चुनावी चक्रव्यूह में ऐसे फंसे कि मतों का विभाजन हो गया। नतीजा यह रहा कि कई सीटों पर जाट मतदाताओं के निर्णायक की भूमिका में होने के बाद भी जाट प्रत्याशियों को चित होना पड़ा। यह हालात तो तब रहे, जबकि कई सीटों पर जाट वोटरों की संख्या 30 फीसदी से भी ज्यादा रही।

जाट लैंड पर ही भटके
जाट बहुल क्षेत्र में ही जाटों के वोट जमकर बंटे। पिछले चुनाव की बात करें तो सहारनपुर की सात में से एक भी विधानसभा सीट पर जाट समाज का प्रतिनिधित्व शून्य रहा। मुजफ्फरनगर और खतौली सीट पर भी यही हाल रहा। चरथावल में सपा से मुकेश चौधरी और पीस पार्टी से प्रदीप बालियान चुनावी मैदान में उतरेे और दोनों ही हार गए। मीरापुर में भाजपा के वीरपाल निर्वाण को हार का मुंह देखना पड़ा। बुढ़ाना में रालोद के राजपाल बालियान चित हो गए। साथ ही भाजपा से उमेश मलिक, बसपा से योगराज भी चुनावी जंग में ढेर हुए। शामली जिले के थानाभवन में भी स्थिति शून्य रही। शामली में जरूर पंकज मलिक को सफलता हाथ लगी। हालांकि, मुकाबले में यहां भी भाजपा से सतेंद्र वर्मा और बसपा से बलवीर मलिक थे। मेरठ की बात करें तो यहां एक भी सीट पर जाट उम्मीदवार नहीं जीत सके। सिवालखास से चुनावी रण में उतरे रालोद से यशवीर सिंह, भाजपा से समरपाल और बसपा से जगत सिंह को हार का मुंह देखना पड़ा। सरधना सीट से चंद्रवीर हार गए। बाकी सीटों पर भी स्थिति शून्य रही।
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बागपत में भी बदला गणित
बागपत जैसी जाट बहुल सीट पर चुनावी मैदान में सपा से उतरे साहब सिंह चारों खाने चित हो गए। यही हाल बड़ौत का रहा। यहां सपा के अजय कुमार, रालोद के अश्वनी तोमर और जदयू के ओमवीर तोमर चुनाव हार गए। हालांकि, छपरौली में वीरपाल राठी जीते। उधर, बिजनौर से कुंवर भारतेन्द्र भी चुनाव में जीते थे। चांदपुर से भाजपा की कविता चौधरी और रालोद से स्वामी ओमवेश तक चुनाव हार गए। बढ़ापुर, नूरपुर, नजीबाबाद, धामपुर में उपस्थिति ही शून्य रही।

गाजियाबाद में भी यही कहानी
लोनी, साहिबाबाद और गाजियाबाद में तो जाट प्रत्याशियों की मुख्य दलों से उपस्थिति ही सिफर रही। मुरादनगर में भाजपा के ब्रजपाल तेवतिया चुनाव हार गए। मोदीनगर में मास्टर राजपाल हारे। गढ़ सीट पर रालोद के रविंद्र चौधरी और भाजपा के कृष्णवीर चुनाव हारे। दादरी में भी यही हाल रहा। बुलंदशहर में सिकंदराबाद सीट पर सुखद परिणाम रहा। भाजपा की विमला सोलंकी चुनाव जीतीं। बुलंदशहर सीट से वीरेंद्र सिरोही चुनाव हार गए तो शिकारपुर में रालोद से किरणपाल को मात मिली। अनूपशहर से गजेंद्र चौधरी चुनावी रण में जीते। डिबाई, स्याना, खुर्जा आदि पर स्थिति शून्य ही रही।

इस बार फूंक फूंक कर कदम
इस बार सियासी दल इस गणित को लेकर सजग हैं। मंथन यह है कि अन्य बिरादरियों के मुकाबले कई कई जाट उम्मीदवार मैदान में न उतारे जाएं। उधर, जाट वोटर भी इसका आंकलन कर रहे हैं। वेस्ट की विभिन्न सीटों पर जाटाें की खासी तादाद है। वोटों में एकजुटता नजर आई तो इस बार पिछले चुनाव की भरपाई बेहतर ढंग से हो सकती है।

आरक्षण है मुख्य मुद्दा
संयुक्त जाट आरक्षण संघर्ष समिति के अध्यक्ष पुष्पेंद्र चौधरी कहते हैं कि केन्द्रीय सेवाओं में जाटों का आरक्षण 17 मार्च 2015 को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया था। 26 मार्च 2015 को प्रधानमंत्री आवास पर जाटों की बैठक हुई थी। पीएम ने कहा था कि मैं खुद इसका पक्षधर हूं पर अभी तक कोई लाभ नहीं हुआ। फरवरी 2016 में हरियाणा आंदोलन में जो हुआ, वह सभी को पता है। बावजूद इसके आज तक आरक्षण नहीं मिला। वह कहते हैं कि जाटों की प्राथमिकता जाट आरक्षण की है और सभी जाट इस तरफ ही देख रहे हैं।
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