नये शस्त्र लाइसेंस बनाने पर हाईकोर्ट की सशर्त रोक है। लेकिन, इस आदेश में विरासत और स्पोर्ट्स शूटर के लाइसेंस को प्रतिबंध के दायरे से बाहर रखा गया था। करीब ढाई साल से विरासत के शस्त्र लाइसेंस भी नहीं बनाए जा रहे हैं। ऐसे में मृतक आश्रितों के लाइसेंस न बनने से दो सौ से ज्यादा शस्त्र जंग खा रहे हैं।
प्रदेश में अंधाधुंध बने शस्त्र लाइसेंस को लेकर हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की गई थी। इस पर कोर्ट ने नये लाइसेंस जारी करने पर सशर्त रोक लगा दी थी। आदेश में स्पष्ट कहा गया था कि पूरी तरह छानबीन के बाद ही जरूरतमंद को लाइसेंस जारी किये जाएं। लेकिन इसमें कुछ छूट भी दी थी।
यह हो रहा है
मेरठ को छोड़कर प्रदेश के सभी जिलों में स्पोर्ट्स शूटर और विरासत के शस्त्र लाइसेंस बन रहे हैं। लेकिन, मेरठ में पिछले ढाई साल के भीतर सिर्फ स्पोर्ट्स शूटर के ही कुछ लाइसेंस जारी हुए हैं। विरासत का एक भी लाइसेंस जारी नहीं हुआ है। विरासत के अधिकांश मामले लाइसेंस धारक की मृत्यु के बाद उसके वारिस के नाम लाइसेंस बनने और शस्त्र उसके नाम पर चढ़ने के हैं। इक्का-दुक्का मामले ही ऐसे हैं, जिसमें शस्त्र लाइसेंस धारक ने बुढ़ापे के कारण अपना शस्त्र लाइसेंस अपने वारिस के नाम पर करने का आवेदन किया है। लेकिन, नियमानुसार यह भी विरासत की श्रेणी में आता है।
ढाई साल से फंसे आवेदन
विरासत के आवेदकों में करीब 100 केस ऐसे हैं, जिनके आवेदन को पिछले ढाई से दो साल हो गए हैं। बाकी आवेदन इसके बाद के हैं। शस्त्र लाइसेंस धारक की मृत्यु के बाद शस्त्र को थाने या शस्त्र की दुकान पर जमा किया जाता है। थाने में जमा शस्त्र जहां जंग खा रहे हैं। वहीं शस्त्र विक्रेता की दुकान पर जमा शस्त्र का शुल्क लगातार बढ़ता जा रहा है।