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वीरों की शौर्य गाथा को सलाम

Thu, 07 Jul 2016 02:00 AM IST
अमर उजाला ब्यूरों
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फाइल फोटो - फोटो : अमर उजाला
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 कारगिल युद्ध में भारतीय सेना ने अपने शौर्य के बल पर नया इतिहास लिख दिया था। दुर्गम पहाड़ियों पर न केवल खुद को बचाया, बल्कि दुश्मनों की भी लाशें बिछा दी थीं। एक-एक जवान ने दर्जनों घुसपैठियों को मार गिराया था। 17वीं बटालियन गढ़वाल राइफल्स के जांबाजों ने सबसे पहले मातृ भूमि से दुश्मन को खदेड़ा था। पाइन इन्फेंट्री डिवीजन की 17वीं बटालियन गढ़वाल राइफल्स मेरठ छावनी में मौजूद है। बटालियन 7 जुलाई को अपना विजय दिवस धूमधाम से मनाएगी।
 
दुश्मनों ने भारतीय सीमा में की थी घुसपैठ
दुश्मन ने सन 1999 में भारत की सीमा में घुसपैठ करके कारगिल के बटालिक उपक्षेत्र में भारतीय पोस्टों पर कब्जा कर लिया था। दुश्मन कश्मीर को भारत से अलग करना चाहता था। इसके लिए बटालिक-लेह राष्ट्रीय राजमार्ग पर 6 से 8 किमी की दूरी पर कब्जा कर लिया था। यहां की ऊंचाई समुद्र तल से 18000 फीट है, ऑक्सीजन का घनत्व बहुत कम है।
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पीस इलाके में बटालियन थी तैनात
17वीं बटालियन गढ़वाल राइफल्स उस समय पीस इलाके में तैनात थी। बटालियन को दुश्मन पर हमला करने का आदेश मिला। यह किसी भी सैनिक और बटालियन के लिए गौरव का अवसर था। 31 मई 1999 को बटालियन पिथौरागढ़ से जम्मू कश्मीर के लिए रवाना हुई। दुर्गम पहाड़ियों से होते हुए बटालियन 10 जून 1999 को युद्ध क्षेत्र में पहुंची। बटालियन के पास युद्ध की तैयारी के लिए बहुत कम समय था। इसी समय में जवानों ने अपने युद्ध की रणनीति तैयार की। 26 जून 1999 को बटालियन को युद्ध के लिए तैनात किया गया। युद्ध के लिए परिस्थितियां विपरीत थी। हर कदम पर दुश्मन का खतरा था। मौसम और ऊंची पहाड़ियां भी जवानों की परीक्षा ले रही थी। लेकिन जवान डटे रहे और सफलता प्राप्त की।

दो चरणों में हुई कार्रवाई
29-30 जून की रात जुबार पर्वत श्रेणी पर दो टुकड़ियों के साथ दुश्मन को उखाड़ फेंकने की कार्रवाई शुरू की गई। दुश्मन की भारी गोलाबारी के बावजूद 30 जून 1999 को बटालियन ने पहला चरण पूरा किया। 30 जून की रात को युद्ध के अगले चरण में काला पत्थर और बम्प पर्वत श्रेणी पर विजय पताका फहराने का फैसला किया गया। अब दुश्मन और भी अधिक सतर्क और तैयार था। परिस्थितियां ऊंचाई के साथ और कठिन हो चुकी थी। दुश्मन द्वारा भारी और सटीक गोलाबारी के बीच बहादुर गढ़वाली अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते रहे। काला पत्थर पर कब्जा करती टुकड़ी का नेतृत्व निडर और निर्भीक मेजर पीके जेटली और कप्तान जिंटू गोगोई कर रहे थे। विषम परिस्थितियों में कप्तान जिंटू गोगोई हमले का नेतृत्व करते हुए सेना की उच्चतम परंपरा को कायम रखते हुए आगे बढ़ते रहने का निर्णय लिया। दुश्मन से लोहा लेते हुए आखिरी सांस तक डटे रहे और अंत में अपने प्राण मातृभूमि की रक्षा करते हुए न्यौछावर कर दिए। दुश्मन ऊंचाई पर था और अपनी ओर आते हुए हर बहादुर गढ़वाली को देखकर उन पर भारी गोलाबारी कर रहा था। यह लड़ाई कई दिन तक निरंतर चलती रही। इस हमले में 1 अधिकारी और 11 जवान शहीद हो गए थे।
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जब दुश्मन को मार भगाया
7 जुलाई को सूरज की पहली किरण के साथ ही जवान पर्वत श्रेणियों पर कब्जा करते रहे। एक बार फिर काला पत्थर, बम्प, कुकरथांग पर तिरंगा फहराया। 7 जुलाई 1999 के बटालियन के बहादुर जवानों ने अंतिम लक्ष्य पर भी जीत का तिरंगा फहराया और बटालिक उप क्षेत्र में सीमा रेखा पर अनुल्लघनियता स्थापित की। बटालियन के सभी पदों के उच्च कोटी की अनुकरणीय प्रेरणा, अलंकृत साहस और वीरता का प्रदर्शन किया। 17वीं बटालियन गढ़वाल राइफल्स ने एक प्रतिभाशाली ढंग से नियोजित और सतर्कता पूर्वक संचालित आपरेशन द्वारा दुश्मन को बटालिक की सीमा रेखा से खदेड़ भगाया और सभी महत्वपूर्ण चोटी के साथ-साथ उस पर्वत श्रेणी की सभी पोस्टों पर एक बार फिर तिरंगा फहराया। आपरेशन में 2 अधिकारी और 19 जवान शहीद हो गए। इस दिन को बटालियन शहीदों को याद करती है। जवानों के परिवार और वीर नारियों को सम्मानित किया जाता है।

ये हुए शहीद
कप्तान जिंटू गोगोई, वीर चक्र (मरणोपरांत)
सूबेदार प्रताप सिंह
हवलदार मदन सिंह
नायक शिव सिंह, सेना मेडल (मरणोपरांत)
नायक ज्ञान सिंह
नायक सुरेंद्र सिंह
लांसनायक मदन सिंह
लांसनायक देवेंद्र प्रसाद, सेना मेडल (मरणोपरांत)
लांसनायक (बीबी) हरीश सिंह
लांसनायक दिनेश दत्त
लांसनायक कृपाल सिंह
लांसनायक (टीएस) दिलवर सिंह
राइफल मैन रंजीत सिंह
राइफल मैन जयदीप सिंह
राइफल मैन विजय सिंह
राइफल मैन वीरेंद्र लाल
राइफल मैन रामप्रसाद
राइफल मैन अमित नेगी
राइफल मैन सतीश चंद्रा
राइफल मैन दलवीर सिंह
राइफल मैन भगवान सिंह  

ऑपरेशन विजय में बटालियन को मिले ये पुरस्कार
जीओसी इन सी उत्तरी कमांड यूनिट प्रशंसा पत्र - 1
वीर चक्र -    1
सेना मैडल - 3
सीओएएस प्रशंसा पत्र -    3
जीओसी इन सी उत्तरी कमांड प्रशंसा पत्र - 9

ये वीर नारियां होंगी सम्मानित
मक्खी देवी, पत्नी शहीद हवलदार मदन सिंह
शकुंतला देवी, पत्नी शहीद नायक ज्ञान सिंह।
नंदी देवी, पत्नी शहीद लांस नायक देवेंद्र प्रसाद।
जयंती देवी, पत्नी शहीद लांस नायक राम प्रसाद।
बिमला देवी, पत्नी शहीद लांस नायक कृपाल सिंह।
सरला देवी, पत्नी शहीद राइफल मैन रंजीत सिंह।
कमला देवी, पत्नी शहीद लांस नायक दिलवर सिंह।
सुधा देवी, पत्नी शहीद लांस नायक दिनेश दत्त सिंह।
सुंदरी देवी, पत्नी शहीद राइफलमैन भगवान सिंह।

आज ये कार्यक्रम
सुबह सात बजे मंदिर परेड
9 बजे शहीदों को श्रद्धांजलि
10:30 बजे सैनिक सम्मेलन
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