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एक्सक्लूसिव रिपोर्ट: हिंदी भवन में चल रहा भैंसों का तबेला, 40 साल पहले ऐसे खुली थी डेयरी

Sun, 21 Apr 2019 11:13 AM IST
कपिल kapil अनुज मित्तल, अमर उजाला, मेरठ
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हिंदी भवन की जमीन पर कब्जा कर खोला गया भैंसों का तबेला - फोटो : अमर उजाला
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मेरठ में पटेल नगर स्थित पुरुषोत्तम दास टंडन हिंदी भवन का नाम कभी हिंदी साहित्यकारों में न केवल चर्चित रहता था, बल्कि इतिहास के पन्नों में भी दर्ज था। शहर के नामचीन लोग इस हिंदी भवन सोसायटी के पदाधिकारी थे। लेकिन समय के साथ यह भवन न केवल जीर्णशीर्ण होकर पूरी तरह ध्वस्त हो गया, बल्कि इसकी जमीन पर कब्जा होने के भी आरोप लग रहे हैं। यही नहीं, हिंदी भवन की 800 वर्ग जमीन पर भैंसों की डेयरी चल रही है, जिसे खाली कराना समिति के लिए मुसीबत बन चुका है। वहीं इस डेयरी के कारण आसपास के लोग अलग से परेशान हैं। 

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ऐसे खुली डेयरी 
बताया गया कि करीब 40 साल पहले समिति के एक पदाधिकारी ने थापर नगर निवासी अपने एक मित्र को गाय पालने के लिए इस परिसर में जगह दी थी। लेकिन उक्त व्यक्ति ने गायों की संख्या बढ़ाते हुए पूरी डेयरी तैयार कर दी। जब डेयरी खुली तो उसका किराया हिंदी भवन समिति की तरफ से 700 रुपये प्रति माह किराया तय हुआ। लेकिन जब काफी समय बाद भी डेयरी संचालक ने किराया नहीं बढ़ाया और पशुओं की संख्या के साथ कब्जा बढ़ता गया तो समिति के वर्तमान सचिव दिनेश चंद जैन ने डेयरी संचालक टीटू जैन से इस जगह को खाली करने के लिए कहा। लेकिन टीटू जैन ने जगह खाली नहीं की, इसके बाद कुछ लोगों के साथ बैठक में मौखिक रुप से किराया 9000 रुपये प्रति माह तय हो गया। लेकिन टीटू जैन से अपनी डेयरी यहां से नहीं हटाई। समिति के सचिव दिनेश चंद जैन ने जगह खाली कराने के लिए कोर्ट में वाद दायर कर दिया, जो अभी विचाराधीन है। 

कब्जे के साथ फैला रहे गंदगी 
हिंदी भवन की जमीन पर कब्जा करने के साथ ही इस डेयरी से होने वाली गंदगी से आसपास के लोग परेशान हैं। लोगों का आरोप है कि डेयरी संचालक ने हिंदी भवन परिसर से पाइप सीधे नाले में डाल रखा है और सबमर्सिबल चलाकर गोबर आदि इस पाइप के जरिए नाले में बहा दिया जाता है, जिससे नाले में हमेशा बदबू रहती है और आसपास के लोगों का जीवन नारकीय हो गया है।

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दो बार नोटिस, नहीं हुई कार्रवाई
नगर निगम इस डेयरी के खिलाफ दो बार नोटिस जारी कर चुका है। हाल ही में 20 हजार रुपये जुर्माने का भी नोटिस जारी किया। लेकिन डेयरी को हटाने में नाकामयाब रहा।

निगम नहीं दे रहा सहयोग
हम इस डेयरी को हटवाकर दोबारा से हिंदी भवन निर्माण की पूरी कोशिश कर रहे हैं। इसी के तहत वाद भी दायर किया हुआ है। लेकिन नगर निगम आदि से कोई भी सहयोग नहीं मिल रहा है। हिंदी भवन की करीब 800 वर्ग गज जमीन पर यह डेयरी चल रही है। - दिनेश चंद जैन, सचिव, पुरुषोत्तम दास टंडन हिंदी भवन

न किसी को दिक्कत, न अवैध कब्जा
डेयरी संचालन की अनुमति दिनेश चंद जैन के पिता ने मेरे पिता को दी थी। इसका किराया भी हम लगातार दे रहे हैं। डेयरी से किसी को कोई दिक्कत नहीं है और न ही कोई अवैध कब्जा है। - टीटू जैन, डेयरी संचालक 

बाहर जाएंगी डेयरियां
हमने शहर की सभी डेयरियों का सत्यापन कराना शुरू कर दिया है। सभी डेयरियों के चालान भी किए जा रहे हैं। डेयरियां शहर से बाहर की जाएंगी। हाईकोर्ट का आदेश आ गया है। - डॉ. गजेंद्र सिंह, नगर स्वास्थ्य अधिकारी
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शहर में थी एक अलग पहचान
हिंदी भवन की स्थापना 1965 में हुई थी, जबकि इसका भवन पुराना था। करीब 2800 वर्ग गज जमीन पर बने इस हिंदी भवन की समिति की शहर में अलग पहचान थी। लेकिन समय के साथ हिंदी भवन के रखरखाव पर ध्यान नहीं दिया गया और इसका भवन क्षतिग्रस्त हो गया। जीर्णशीर्ण भवन को पिछले साल ध्वस्त करा दिया गया और वहां खाली मैदान है। लेकिन हिंदी भवन जाने वाले रास्ते के एक तरफ एक बड़ी डेयरी संचालित है, जिसमें करीब 100 गाय और भैंस बंधी हैं। जबकि अंदर के खाली मैदान में एक आइसक्रीम फैक्टरी के मालिक ने अपने ठेले खड़े करने शुरू कर दिए हैं। अब सिर्फ द्वार पर लगे साइन बोर्ड से ही पता चलता है कि यहां कभी हिंदी भवन हुआ करता था। 

कभी शोधार्थी आकर करते थे पढ़ाई 
पुरुषोत्तम दास टंडन हिंदी भवन में नए-पुराने हिंदी साहित्य की करीब पांच हजार किताबें मौजूद थीं। यहां पर न केवल छात्र पीएचडी के लिए यहां की किताबों का सहारा लेते थे, बल्कि हिंदी साहित्यकारों द्वारा बैठकों के साथ यहां पर हिंदी साहित्य को बढ़ावा देने के लिए काव्य गोष्ठियां भी आयोजित की जाती थीं। इसके अलावा इस हिंदी भवन में हिंदी के मेधावी छात्रों को सम्मानित किया जाता था। तुलसी जयंती पर भी कार्यक्रम आयोजित होता था। इस भवन के परिसर में कार्यालय के अतिरिक्त एक बड़ी लाइब्रेरी, शौचालय आदि के साथ कर्मचारियों का कक्ष भी था।

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