इसके बाद दीपांश साइकिल बनाने में जुट गया। दीपांश ने ढाई माह के प्रयास से सफलता पाई। इतना ही नहीं, दीपांश ने साइकिल को अपने विश्वविद्यालय परिसर में चलाकर भी दिखाया। विश्वविद्यालय के कृषि विभाग ने उन्हें सम्मानित किया।
इसके बाद दीपांश ने साइकिल चलाने की सीडी और फोटो गिनीज बुक, लिम्का बुक और इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स के लिए भेजे। सबसे पहले इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स से सर्टिफिकेट मिला।
अब तीन अप्रैल 2019 को लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स की ओर से भी सर्टिफिकेट दीपांश के पास पहुंचा है। अभी गिनीज बुक से सर्टिफिकेट आना बाकी है। दीपांश की सफलता से पिता उपेंद्र तोमर और मां रीना तोमर बेहद खुश हैं।
दूसरी बार में मिली सफलता
दीपांश ने गिनीज और लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स की शर्तों के अनुरूप मार्च में ही साइकिल बनाने का काम शुरू किया। पहली बार जो साइकिल बनी उसका वजन डेढ़ क्विंटल से अधिक था।
जब दीपांश ने साइकिल को चलाने का प्रयास किया तो अधिक वजन होने की वजह से साइकिल के पहिए मुड़ गए। इसके बाद दीपांश ने साइकिल का फ्रेम लोहे की जगह एल्यूमीनियम का बनाया। साइकिल का वजन 90 किलोग्राम है। साइकिल की सीट 22 फुट ऊंची है, जिस पर बैठने के लिए सीढ़ी का सहारा लेना पड़ता है।