Meerut News: मेरठ के सीसीएसयू विवि और हरिद्वार के गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के साझा शोध में बड़ी कामयाबी मिली है। नई तकनीक डाई और एंटीबायोटिक प्रदूषण हटाने में 95 प्रतिशत तक प्रभावी साबित होगी।
जल प्रदूषण की बढ़ती चुनौती के बीच चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय (सीसीएसयू) और गुरुकुल कांगड़ी (डीम्ड टू बी विश्वविद्यालय) हरिद्वार के वैज्ञानिकों ने मिलकर ऐसी नैनो तकनीक विकसित की है, जो सूर्य के प्रकाश से प्रदूषित पानी को शुद्ध करेगी। इस शोध में सेरियम मिश्रित टिन ऑक्साइड एसएनओ-2 नैनोकण विकसित किए गए हैं, जो औद्योगिक रंगों और एंटीबायोटिक अवशेषों को प्रभावी ढंग से विघटित करने में सक्षम हैं।
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सीसीएसयू के प्रो. संजीव कुमार और गुरुकुल कांगड़ी विवि के प्रो. महेंद्र पाल ने मिलकर यह शोध किया है। इन वैज्ञानिकों ने जल तापीय अवक्षेपण तकनीक के माध्यम से विभिन्न सांद्रता वाले सेरियम मिश्रित टिन ऑक्साइड नैनोकण तैयार किए हैं। उन्हें 600 डिग्री सेल्सियस तापमान पर संसाधित किया गया है। अध्ययन में पांच प्रतिशत सेरियम मिश्रण वाला नमूना सबसे अधिक प्रभावी पाया गया।
इस प्रकाश उत्प्रेरक ने प्राकृतिक सूर्य के प्रकाश में क्रिस्टल वायलेट रंग का 95.36 प्रतिशत, मेथिलीन ब्लू का 93.39 प्रतिशत, मेथिल ऑरेंज का 86.66 प्रतिशत तथा सिप्रोफ्लॉक्सासिन एंटीबायोटिक का 79 प्रतिशत तक सफलतापूर्वक अपघटन किया।
शोधकर्ताओं के अनुसार, सेरियम मिश्रण के कारण टिन ऑक्साइड का ऊर्जा अंतराल 3.50 इलेक्ट्रॉन वोल्ट से घटकर लगभग 3.35 इलेक्ट्रॉन वोल्ट रह गया। इससे यह केवल पराबैंगनी किरणों पर निर्भर नहीं रहा, बल्कि सूर्य के दृश्य प्रकाश का भी प्रभावी उपयोग करने लगा। साथ ही ऑक्सीजन रिक्तियों और सेरियम के ऑक्सीकरण–अपचयन चक्र के कारण सक्रिय ऑक्सीजन कणों का निर्माण बढ़ा, जिससे प्रदूषकों का तेजी से विघटन संभव हुआ।
शोध की विशेषता
इस शोध की विशेषता यह है कि वैज्ञानिकों ने केवल एक प्रकार के प्रदूषक पर नहीं, बल्कि तीन औद्योगिक रंगों और एक प्रमुख एंटीबायोटिक के एकसाथ अपघटन का अध्ययन किया। इसके अलावा विभिन्न सेरियम सांद्रताओं और 600 डिग्री सेल्सियस पर तापीय संसाधन के संयुक्त प्रभाव का विश्लेषण कर यह स्पष्ट किया कि संरचनात्मक परिवर्तन, प्रकाशीय गुणों और प्रकाश उत्प्रेरक क्षमता के बीच सीधा संबंध है।
शोध को केवल प्रयोगशाला तक सीमित नहीं रखा गया। वैज्ञानिकों ने घनत्व फलन सिद्धांत (डीएफटी) आधारित सैद्धांतिक गणनाओं के माध्यम से भी यह प्रमाणित किया कि सेरियम मिश्रण से इलेक्ट्रॉनिक संरचना, ऊर्जा अंतराल और इलेक्ट्रॉन घनत्व में होने वाले परिवर्तन ही इस उच्च प्रकाश उत्प्रेरक क्षमता के प्रमुख कारण हैं।
शोधकर्ताओं का कहना है कि इस तकनीक में महंगे कृत्रिम प्रकाश स्रोत की आवश्यकता नहीं होती। प्राकृतिक सूर्य के प्रकाश से कम लागत में जल शोधन किया जा सकता है। भविष्य में वस्त्र, औषधि, रसायन और रंग उद्योगों के अपशिष्ट जल के उपचार में यह तकनीक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। बड़े पैमाने पर इसके उपयोग से स्वच्छ जल उपलब्ध कराने, पर्यावरण संरक्षण और एंटीबायोटिक प्रदूषण पर नियंत्रण की दिशा में महत्वपूर्ण सफलता मिलने की उम्मीद है।