खराब दिनचर्या है बीमारी का कारण
वैद्य सुनील आर्य ने कहा कि अब बीमारी का बड़ा कारण दिनचर्या खराब होना है। जब सोना चाहिए तब जागते हैं, जब जागना चाहिए तब सोते हैं। आजकल एच3एन2 वायरस से खांसी बुखार हो रहा है। इसका इलाज उन्होंने बताया कि अगर गाय के एक चाय के चम्मच घी में अजवाइन, सौंठ और हल्दी (तीनों मिलाकर आधा चाय की चम्मच) को मिलाकर उसका झौंक एक गिलास गाय के दूध में लगाकर उसे चार से पांच दिन पी लिया जाए तो पता भी नहीं चलेगा खांसी कहां गई। बिल्कुल ठीक हो जाएगी।
मोबाइल के दौर में अक्षी तर्पण से करें आंखों की हिफाजत
आयुर्वेद चिकित्सक डॉ. प्रीति छाबड़ा ने कहा कि अब मोबाइल और कंप्यूटर का दौर है। ऐसे में आंखों की समस्याएं पैदा हो रही हैं। आंखों की हिफाजत के लिए आयुर्वेद में अक्षी तर्पण (नेत्र देखभाल उपचार) का इस्तेमाल किया जा सकता है। अक्षी तर्पण का उपयोग आंखों की मांसपेशियों को मजबूत करने के लिए किया जाता है। इसके तहत आंखों को गुनगुने पानी से धोने के बाद रूई से अच्छी तरह सुखाया जाता है। इसके बाद आंखों पर घी इकट्ठा करने के लिए चारों ओर उड़द के आटे की दीवारें बनाई जाती हैं। शरीर के तापमान के बराबर गुनगुने (नीम गर्म) घी को नाक के ऊपर से धीरे-धीरे टपकाया जाता है जो आंखों के चारों ओर इकट्ठा होता रहता है। इसके बाद मरीज आंखें खोलता और बंद करता है। इस घी के ठंडा होने पर फिर नीम गर्म घी डालते हैं, ऐसा तीन बार होता है। अंत में आंखें गर्म पानी से धोकर 10-15 मिनट तक आराम करना चाहिए।
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आयुर्वेदाचार्यों समेत 100 लोगों को किया गया सम्मानित, 19 शोध पत्र प्रस्तुत
महासम्मेलन के समापन कार्यक्रम में आयुर्वेदाचार्यों समेत 100 लोगों को सम्मानित किया गया। उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों के अलावा, राजस्थान, मध्यप्रदेश और हरियाणा आदि से आए 50 आयुर्वेद के चिकित्सकों को सम्मानित किया गया। महासम्मेलन के पदाधिकारियों डॉ. ब्रजभूषण शर्मा और वैद्य गोपाल दत्त, वैद्य अवधेश श्रीवास्तव और क्षेत्रीय आयुर्वेदिक यूनानी अधिकारी रेणु चौधरी समेत 15 लोगों के सम्मानित किया गया। इनके अलावा औद्योगिक इकाइयों, आयुर्वेद के कॉलेजों और स्टॉल लगाने वालों 35 प्रतिनिधियों को भी सम्मान में शॉल, मोमेंटो और प्रशस्ति पत्र दिए गए। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि एमएलएसी धर्मेंद्र भारद्वाज रहे। वहीं, प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता में 20 छात्र-छात्राओं का सम्मान किया गया। तीन दिनों में 19 शोध पत्र प्रस्तुत किए गए। तीन दिन में 2500 मरीजों को ओपीडी में देखा गया। 12 वैज्ञानिक सत्र आयोजित किए गए।