अशोक जैन का जन्म 1945 में नगीना के एक साधारण परिवार में हुआ था। परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक न होने पर उन्होंने सड़कों पर अखबार, बिस्किट आदि बेचने का काम किया। अशोक जैन शौकिया तौर पर धीरे धीरे टूटी फूटी कविताएं लिखने लगे। कविता लिखने में कुछ सिद्धहस्त होने पर उन्होंने रश्मि नाम से कविताएं लिखनी शुरू कीं जो पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुईं। वर्धमान कॉलेज में एडमिशन लेने पर वे हिंदी विभागाध्यक्ष डा.रामस्वरूप आर्य व अन्य कवियों के संपर्क में आए।
खर्च निकालने के लिए कविता की हास्य विधा में डंठल के नाम से मशहूर इंस्पेक्टर त्रिलोकीशरण श्रीवास्तव की बेटी को पढ़ाने घर जाने लगे। कवि डंठल के कहने पर उन्होंने हास्य में हाथ आजमाया और पहली कविता हलवाई की बेटी लिखी। यह कविता पदम्श्री गोपाल प्रसाद व्यास द्वारा पुस्तक हास्य रस के हल्के में प्रकाशित हुई।
इसके बाद अशोक जैन और हास्य रस ने एक दूसरे को अपना लिया। एक कवि सम्मेलन में हास्य कवि स्व.सत्यदेव शास्त्री भौंपू ने अशोक जैन का नाम हुक्का रख दिया। अशोक जैन ने हुक्का बिजनौरी के पीछे बिजनौरी और जोड़ दिया और रश्मि से हुक्का बिजनौरी बन गए। तब से शुरू हुआ हुक्का बिजनौरी का सफर आज पूरे देश में जारी है। 73 साल की आयु में भी वे अपनी कविताएं से श्रोताओं को गुदगुदा रहे हैं।
हुक्का बिजनौरी देश के लगभग सभी प्रदेशों में कवि सम्मेलनों में हिस्सा ले चुके हैं। वह कई टीवी चैनलों पर भी प्रस्तुति दे चुके हैं। कवि सम्मेलनों का संचालन करते हुए चुटकुले व व्यंग सुनाना उनकी विशेषता है। उनकी कविताएं भ्रष्टाचार पर कटाक्ष करती हैं। अशोक जैन उर्फ हुक्का बिजनौरी का कहना है कि जीवन में हंसी से बढ़कर कोई दौलत नहीं है। वे चाहते हैं कि लोगों को ज्यादा से ज्यादा हंसाए। जब भी उनका जिक्र कहीं हो तो लोग मुस्कुराहट के साथ उन्हें याद करें।
भ्रष्टाचार पर हुक्का बिजनौरी की एक कविता के बोल-
रात के अंधेर में एक अधिकारी
एक इंजीनियर तथा ठेकेदार में
पता नहीं क्या करार हो गया।
कि सुबह होते ही एक पुल
नदी को लेकर फरार हो गया।।