ये भी हैं शामिल
भाजपा किसान मोर्चा के प्रदेश उपाध्यक्ष संजय त्यागी पर थाना मेडिकल में वर्ष 2006 में दर्ज मुकदमे को वापस लेेने की बात कही जा रही है। महानगर उपाध्यक्ष विवेक रस्तोगी पर 2017 में थाना जानी में और भाजयुमो नेता आशीष प्रताप पर वर्ष 2006 व 2008 में थाना सिविल लाइन में दर्ज मुकदमों को वापस करने के लिए पत्र लिखा गया है। गृह विभाग द्वारा इन सभी मुकदमों के बारे में विस्तार से रिपोर्ट देने के लिए कहा है। वहीं इस मामले में एसएसपी अखिलेश कुमार का कहना है कि इस बारे में अभी उन्हें जानकारी नहीं है। हमें अभी कोई निर्देश नहीं मिले हैं।
पहले भी वापस होते रहे हैं सत्ताधारियों के मुकदमे
सत्ता धारी नेताओं पर दर्ज मुकदमे पहले भी वापस होते रहे हैं। पहले बसपा और फिर सपा सरकार में कई बार सत्तापक्ष के नेताओं पर दर्ज मुकदमों को वापस करने की सिफारिश की गई है। कई बार तो ऐसा भी हुआ है जब अपराध के गंभीर मामलों में भी सरकार ने मुकदमा वापसी के लिए पत्र लिख दिया। तिहरे हत्याकांड के आरोपी जेल में बंद इजलाल के खिलाफ दर्ज मुकदमों को पिछली सरकार ने वापस करने के लिए पत्र लिखा और कहा कि रिपोर्ट भेजी जाए।
इस पर हंगामा हो गया था और तत्कालीन एसएसपी डीसी दूबे ने स्पष्ट कह दिया था कि इसके पक्ष में शासन को रिपोर्ट भेजी ही नहीं जा सकती है। यह गंभीर अपराध है। रिपोर्ट इंकार में गई और मुकदमा वापस नहीं हुआ। हालांकि समय समय पर लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम या राजनीतिक मामलों में दर्ज मुकदमों को सत्तापक्ष वापस करता है और ऐसे मामलों में रिपोर्ट भी सकारात्मक चली जाती है। इस तरह के मामले पहले भी प्रकाश में आते रहे हैं।
यह है प्रक्रिया
मुकदमा वापसी की प्रक्रिया के लिए जिलाधिकारी की ओर से एसएसपी को पत्र जाता है। वहां से पूरी जांच की जाती है कि मुकदमे को क्या वापस किया जा सकता है। मुकदमा दर्ज करने का वास्तविक आधार क्या था? आपराधिक मुकदमा है या राजनीतिक।
कई बार धरने प्रदर्शन आदि के मुकदमे अथवा चुनाव के दौरान धारा 144 अथवा लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम के मुकदमों को वापस करने की मशक्कत होती है। पुलिस इस पर पूरी रिपोर्ट देती है जो जिलाधिकारी के माध्यम से शासन को भेजा जाता है। इसी को आधार बनाकर सरकार निर्णय लेती है।
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