कैराना से थानाभवन तक फतेह पर चुनाव में नहीं आलम
शामली के गढ़ीपुख्ता के अमीर आलम 1985 में लोकदल के टिकट पर थानाभवन से विधायक बने। मोरना से 1989 में जनता दल के टिकट पर विधायक बने। 1996 में फिर सपा के टिकट पर थानाभवन से जीते। 1999 में कैराना सीट से सांसद रहे। अमीर के बेटे नवाजिश भी सपा के टिकट पर बुढ़ाना से एमएलए रहे। अबकी इस परिवार से कोई चुनाव में नहीं है।
राना परिवार को भी नहीं मिली जगह
सुजड़ू के कादिर राणा 2007 में मोरना से रालोद के टिकट पर विधायक बने और 2009 में बसपा के टिकट पर मुजफ्फरनगर से सांसद चुने गए। कादिर इस बार चुनाव से पहले सपा में शामिल हुए पर उनके परिवार के किसी सदस्य को टिकट नहीं मिला। उनके भाई नूरसलीम राना चरथावल से बसपा के टिकट पर 2012 में विधायक बने थे। भतीजे शाहनवाज राना बिजनौर से विधायक रहे। कादिर राना की पत्नी सईदा बेगम बुढ़ाना सीट से 2017 का चुनाव हार गई थीं।
राफे खां के परिवार को भी नहीं मिला टिकट
थानाभवन से 1969 और 1977 में विधायक रहे राव अब्दुल राफे खां के बेटे अब्दुल राव वारिस को इस बार टिकट नहीं मिला है। 2007 में अब्दुल राव वारिस रालोद के टिकट पर विधायक बने थे। इस बार वह भी टिकट की दौड़ में पिछड़ गए।
इमरान बाहर, नोमान चुनाव में
सहारनपुर के कद्दावर नेता इमरान मसूद कांग्रेस छोड़ सपा में गए पर टिकट नहीं मिला। इमरान मसूद बेहट से वर्ष 2007 में निर्दलीय विधायक बने थे। उन्होंने 2012 और 2017 का चुनाव नकुड़ से लड़ा पर हार गए। इमरान के भाई नोमान मसूद बसपा के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं। सहारनपुर देहात से विधायक रहे मसूद अख्तर भी चुनावी दंगल में नहीं है।
पहले चरण की 58 सीटों पर बसपा के मुस्लिम प्रत्याशी
सपा रालोद: 12
कांग्रेस: 11
बसपा: 15
शामली: कांग्रेस से अयूब जंग
कैराना: सपा से रालोद नाहिद हसन, कांग्रेस से मोहम्मद अखलाक
थानाभवन: रालोद के अशरफ अली, बसपा के जहीर मलिक
शामली: कांग्रेस के अय्यूब जंग
चरथावल: बसपा के सलमान सईद, कांग्रेस डॉ. यास्मीन
मीरापुर: बसपा के मोहम्मद शालिम, कांग्रेस के मौलाना जमील
सिवालखास: सपा-रालोद से हाजी गुलाम मोहम्मद, बसपा से मुकर्रम अली
सरधना: कांग्रेस से सैयद रिहानुद्दीन
किठौर: सपा से शाहिद मंजूर
मेरठ शहर: सपा से रफीक अंसारी, बसपा से दिलशाद शौकत
मेरठ दक्षिण: सपा से आदिल चौधरी, बसपा से कुंवर दिलशाद अली, कांग्रेस से नफीस सैफी
छपरौली: बसपा से मोहम्मद साहिक, कांग्रेस से डॉ. यूनुस चौधरी
बागपत: रालोद से अहमद हमीद
लोनी: कांग्रेस से मोहम्मद यामीन मलिक, बसपा से आकिल
मुरादनगर: बसपा से डॉ. अयूब खां
धौलाना: सपा रालोद से असलम चौधरी, बसपा से बासिद अली
सिकंदराबाद: कांग्रेस से सलीम अख्तर
बुलंदशहर: रालोद से हाजी यूनुस, बसपा से कल्लू कुरैशी
स्याना: रालोद से दिलनवाज खां
शिकारपुर: बसपा से मोहम्मद रफीक, कांग्रेस से जियाउर्ररहमान
कौल: सपा रालोद अज्जू इशहाक, बसपा से मोहम्मद बिलाल
अलीगढ़: सपा रालोद जफर आलम, बसपा से रजिया खान, कांग्रेस से सलमान इम्तियाज
आगरा उत्तरी: बसपा से शब्बीरा अब्बास।
खास बातें:
आगरा की नौ सीटों में से आगरा उत्तरी सीट से बसपा ने केवल शब्बीर अब्बास को प्रत्याशी बनाया है। मथुरा की पांच में से एक भी सीट पर मुस्लिम नहीं हैं।
पहला चरण:
11 जिले 58 सीटें
कहां कितने फीसदी मुस्लिम आबादी:
मेरठ: 34.43
बागपत: 27.98
बिजनौर: 43.04
शामली: 41.73
मुजफ्फरनगर: 40
हापुड़: 32.39
गाजियाबाद: 22.53
नोएडा: 13.08
बुलंदशहर: 22.22
मथुरा: 85.2
आगरा: 9.31
अलीगढ़: 19.85
दूसरा चरण: 9 जिले 55 सीटें
सहारनपुर: 41.95
बिजनौर: 43.04
अमरोहा: 40.04
संभल: 32.88
मुरादाबाद: 50.80
रामपुर: 50.57
बरेली: 34.54
बदायूं: 23.26
शाहजहांपुर: 17.55
दूसरे चरण के सहारनपुर और बिजनौर जिले में मुस्लिम प्रत्याशी
सहारनपुर: बेहट से सपा-रालोद के उमर अली, बसपा से रईस मलिक
नकुड़: बसपा से साहिल खान
सहारनपुर देहात: सपा से आशु मलिक
देवबंद: कांग्रेस से राहत खलील
गंगोह: बसपा से नोमान मसूद
बिजनौर:
नजीबाबाद: सपा से तस्लीम अहमद, बसपा से शाहनवाज आलम, कांग्रेस से अहसान अंसारी
धामपुर: सपा से नईमुल हसन, बसपा से हाजी कमाल, कांग्रेस से हुसैन अहमद
बढापुर: बसपा से मोहम्मद गाजी, कांगेस से अहसान अंसारी
चांदपुर: बसपा से शकील हाशमी
नूरपुर: बसपा से जियाउद्दीन
अखिलेश को सीएम बनाना है
अखिलेश को मुख्यमंत्री बनाना चाहते हैं। इसीलिए वो सपा में आए है। चुनाव नहीं लड़ रहे, लेकिन हाईकमान ने जो आदेश दिया है, उसका पालन कर रहा हूं। सभी सीटों पर गठबंधन के प्रत्याशियों को मजबूती के साथ चुनाव लड़ाया जा रहा है। - इमरान मसूद, सपा नेता
लोकतंत्र में यकीन रखने वाले को करें वोट: उलमा
जो लोकतंत्र में यकीन रखता हो, सेक्यूलर हो, हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई की बात न करके जात-पात से ऊपर उठकर विकास की बात करता हो उसका साथ देना चाहिए। - मौलाना मुफ्ती अरशद फारूकी, ऑनलाइन फतवा चेयरमैन देवबंद दारूल उलूम
लोकतांत्रिक संस्थाओं में हिस्सेदारी के लिए आगे आना होगा
किसी भी मसले के पीछे सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक वजह होती हैं। अगर कोई समाज आर्थिक तौर पर संकट में है तो उसका प्रतिनिधित्व भी कम दिखता है। मुस्लिम आज के वक्त में सामाजिक तौर पर एकजुट दिखना नहीं चाहते। उन्हें निकाय, जिला पंचायत, ग्राम पंचायत, सहकारिता एवं अन्य क्षेत्रों के चुनाव में भागीदारी बढ़ानी होगी ताकि वहां से लोकसभा, विधानसभा के लिए नए नेता निकल सकें। - प्रोफेसर एसके चतुर्वेदी, राजनीति शास्त्री और पूर्व प्रो. वीसी सीसीएसयू मेरठ