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यहां रखी हैं 'प्रथम विश्व युद्ध' के सैनिकों की वर्दियां, मेरठ छावनी से जुड़ी 7 खास बातें  

Sat, 17 Nov 2018 06:35 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मेरठ
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मेरठ छावनी में सबसे पहले स्वतंत्रता संग्राम का बिगुल बजा था। भारत की यह छावनी अंग्रेजों के समय की है। प्रथम विश्व युद्ध के सैनिकों की वर्दियों को यहां आज भी संजोकर रखी गई हैं। 'पंजाब रेजिमेंट' से भी इस छावनी का बहुत पुराना और खास नाता है। आज हम आपको बता रहे हैं प्रसिद्ध मेरठ छावनी से जुड़े कुछ रोचक तथय जिनके बारे में आप शायद ही जानते हों :-

 
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अंग्रेजों ने की थी स्थापना

मेरठ छावनी की स्थापना 1803 में अंग्रेजों के द्वारा की गई थी। यह भारत की दूसरी सबसे पुरानी और बड़ी छावनी है। हाल ही में यहां एक सेना के जवान को पाकिस्तान के लिए जासूसी करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया जिसके बाद छावनी काफी सुर्खियों में रही।
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यहां से धधकी थी स्वतंत्रता संग्राम की ज्वाला

जी हां, यह वही जगह है। जहां से स्वतंत्रता संग्राम का बिगुल बजा। 9 मई साल 1857 की रात को मेरठ छावनी के 85 सैनिकों, ने अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह कर दिया। दरअसल, मेरठ छावनी में चर्बी वाले कारतूस और हड्डियों के चूर्ण वाले आटे की बात गोपनीय तरीके से सैनिकों में पहुंच गई, जिसके बाद सभी सैनिकों ने अंग्रेजों को सबक सिखाने की ठान ली। धनसिंह के नेतृत्व में क्रांतिकारी भीड़ ने रात दो बजे मेरठ जेल पर हमला कर दिया और जेल तोड़कर 836 कैदियों को छुड़ा लिया। जेल से छूटे सभी कैदी क्रांति में शामिल हो गए। यह ब्रिटिश शासन के विरुद्ध एक सशस्त्र विद्रोह था। यह विद्रोह दो वर्षों तक भारत के विभिन्न क्षेत्रों में चला।

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ब्रिटिश काल के हैं कैंट स्टेशन और माल रोड

मेरठ का छावनी स्थित रेलवे स्टेशन भी ब्रिटिश काल का ही बना हुआ है। इसके अलावा मेरठ का माल रोड, मूलतः ब्रिटिश छावनी का ही हिस्सा थी, यहां की एक घटना प्रसिद्ध है कि इस रोड़ पर एक भारतीय जो घोड़ा बग्घी चलाता था उसने एक अंग्रेज अफसर को रेस में हरा दिया था। इस हार को अंग्रेज बर्दाश्त नहीं कर पाए और रघुवीर सारंग को झूठे आरोपों में गिरफ्तार कराकर कोड़े लगवाए गए थे। ब्रिटिश काल में 1940 के दशक में मेरठ के सिनेमाघरों में ब्रिटिश राष्ट्रगान बजने के समय हिलना तक निषेध था।
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पाक यु़द्ध के बाद बनाया गया गुरुद्वारा 
मेरठ छावनी में स्थित शीशे वाला गुरुद्वारा काफी प्रसिद्ध है। दरअसल, इस गुरुद्वारे का संबंध पंजाब रेजिमेंट से है। पंजाब रेजीमेंट 1929 से 1976 तक मेरठ में रही। सन् 1971 में भारत पाक युद्ध में मिली जीत के बाद 1972 में गुरुद्वारे की स्थापना की गई और लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा ने इसकी आधारशिला रखी।
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यहीं पर रखी गई हैं प्रथम विश्व युद्ध के सैनिकों की वर्दियां
मेरठ छावनी में ही स्वतंत्रता संग्राम में शामिल होने वाले तमाम क्रांतिकारियों से जुड़ी वस्तुओं को संजोए रखने वाला एक संग्रहालय भी है। संग्रहालय शहीद स्मारक में स्थित है। शहीद स्मारक उन बहादुरों को समर्पित है, जिन्होंने 1857 में देश के लिए प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अपने प्राणों की आहुति दे दी। संगमरमर से बना यह स्मारक लगभग 30 मीटर ऊंचा है। इस संग्रहालय में प्रथम स्वतंत्रता संग्राम, प्रथम व द्वितीय विश्व युद्ध में शामिल भारतीय सैनिकों की वर्दी से लेकर अन्य कई वस्तुओं को रखा गया है। यहां इन युद्धों से संबंधित कई चित्र व हथियार भी प्रदर्शित किए गए हैं। यहां प्राचीन सिक्कों तथा पोस्टल स्टांप का भी संग्रह किया गया है।
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मेरठ छावनी की पहचान है गांधी बाग
जी हां, यदि आप मेरठ के ‘गांधी गार्डन’ जाते हैं तो समझ जाइए कि आप मेरठ छावनी के भीतर हैं। दरअसल, यह मेरठ का सबसे बड़ा पार्क है जो मेरठ छावनी के अंतर्गत ही आता है। यह पार्क ब्रिटिश काल में बनाया गया। ईस्ट इंडिया कंपनी के समय इस पार्क को ‘कंपनी गार्डन’ या ‘कंपनी बाग’ के नाम से जाना जाता था। आजादी के बाद इसका नाम गांधी बाग कर दिया गया। यहीं पर प्राचीन और उत्तर भारत का प्रसिद्ध ओघड़नाथ शिव मंदिर भी स्थित है।
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उत्तर भारत का सबसे पुराना चर्च भी यहीं पर स्थित है 
मेरठ छावनी में एक अन्य इमारत भी है जो इस छावनी को खास बनाती है। जी हां मेरठ स्थित सेंट जोन्स चर्च भी मेरठ छावनी में ही स्थित है। सन् 1819 से 1821 के बीच बनकर तैयार हुए इस चर्च को ईस्ट इंडिया कंपनी की ओर से चेपलिन रेव हेनरी फिशर ने स्थापित किया था। इस चर्च की गणना उत्तर भारत के सबसे प्राचीन चर्चों में की जाती है। इस विशाल चर्च में दस हजार लोगों के बैठने की क्षमता है।

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