होड़ लगी थी कि मुस्लिम महिलाओं को ‘आजादी’ दिलाने का श्रेय कौन ले जाता है? क्या मोदी सरकार? या ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड जो पूरे भारत में सुन्नी मुसलमानों का प्रतिनिधित्व करता है। बोर्ड कहता रहा कि पर्सनल लॉ पर न्यायपालिका को दखल देने का अधिकार नहीं है। पांच जजों ने 3:2 के मामूली अंतर से पिछले साल तीन तलाक को खत्म करके देश के इतिहास में एक नया अध्याय लिखा तो अब केंद्र सरकार ने इस पर कानून बनाने के लिए अध्यादेश को मंजूरी देकर फिलहाल मुस्लिम महिलाओं को सुरक्षा की गारंटी दे दी है, जिस पर बहस चलती रहेगी।
तीन तलाक का दर्द जिन पर प्रहार बनकर गुजरा है, उनके लिए यह कदम उत्सव से कम नहीं है। देश की आजादी के 71वें वर्ष में अगर सचमुच किसी ने किस्मत के साथ वादे को निभाते हुए देखा है तो वे तलाक पीड़ित महिलाएं ही हैं, खास तौर पर जिन्होंने तीन तलाक की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने का साहस किया। एक बैठकी में तीन बार तलाक कहने की प्रथा जो मुस्लिम मर्दों को (खासकर सुन्नी संप्रदाय के) फौरन एकतरफा और वापस न लिया जा सकने वाला तलाक देने का अधिकार देती थी। यह सदियों से मनमाना अधिकार उन आदिम कानूनों से मिला हुआ था जो मजहब और परंपरा के नाम पर परिवार, शादी, तलाक और विरासत के बारे में फैसला करते आ रहे थे।
देश में मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों के लिए लड़ने वाले संगठन भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन (बीएमएमए) की सह-संस्थापक जकिया सोमन और नूरजहां नियाज ने मार्च 2015 में ‘सीकिंग जस्टिस विदिन फैमिली’ नाम से 5,000 मुस्लिम महिलाओं पर एक सर्वेक्षण किया था। उन्होंने पाया कि तलाकशुदा 59 प्रतिशत महिलाएं तीन तलाक की व्यवस्था से पीड़ित थीं और 92 प्रतिशत महिलाएं इस पर प्रतिबंध लगाने के पक्ष में थीं। उन्होंने 50,000 से ज्यादा हस्ताक्षर जुटाए थे और इसे प्रधानमंत्री के पास भेज दिया था। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद इस पर कानून बनाने को लेकर सियासी ड्रामेबाजी लगातार चल रही थी।
तैंतीस साल पहले जब 65 वर्षीया शाह बानो ने सायरा बानो और आतिया साबरी की तरह ही लडऩे का फैसला किया था तो निजी कानूनों को लेकर एक राजनैतिक लड़ाई छिड़ गई थी। उन्होंने अदालत से उस आदमी से गुजारा भत्ता दिलाने की मांग की थी जिसने उन्हें 1985 में तलाक दे दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने उनके दावे को सही बताया था लेकिन इस पर हंगामा खड़ा हो गया था और तब शाह बानो को अपने पूर्व अमीर शौहर से हर महीने मिलने वाले 25 रुपये की रकम बढ़ाकर 179.20 रुपये करने की मांग करनी पड़ी थी।
यानी मुस्लिम महिलाओं के लिए यह अब निर्वाह या मेहर (शादी के समय वादा की गई रकम) नहीं है। वे अब उन कानूनों को ही चुनौती दे रही हैं जो उन्हें बराबरी का दर्जा नहीं देते। यही बात समझने में मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड चूक गया। सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल अपने फैसले से धार्मिक इकाईयों को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत उनके धार्मिक विचारों के संरक्षण के प्रति आश्वस्त रहने का संदेश दिया था और अब सरकार ने एक कदम उठाकर संविधान की संतुलनकारी भूमिका के सामने खड़े एक खतरे से निजात पाने की कोशिश की है। यह भी दिलचस्प है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले में हर कोई अपने-अपने सीमित उद्देश्यों के हिसाब से राहत और संतोष तलाश कर रहा था। यहीं से केंद्र सरकार को कानून बनाने और राजनीतिक कारणों से इसके पास न होने पर अध्यादेश लाने का कदम उठाना पड़ा।
2017 में सुप्रीम कोर्ट ने ट्रिपल तलाक को असंवैधानिक करार दिया, लेकिन इसे छह माह के लिए निलंबित रखा था, ताकि सरकार इस समस्या से निपटने के लिए विधेयक ला सके। सभी पर्सनल कानून भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत संरक्षित हैं। यहां तक कि इंस्टैंट तलाक भी।
अब क्या होगा?
मुस्लिम पर्सनल लॉ के विशेषज्ञ अनवर अली एडवोकेट कहते हैं, ‘यह कानून इंस्टैंट ट्रिपल तलाक (तलाक-ए-बिदअत) पर लागू होगा। जहां तक तीन तलाक का मामला है, तो इस बारे में कोई गफलत नहीं होनी चाहिए। तलाक-ए-अहसन और तलाक-ए-हसन की छूट आज भी है।’ वे कहते हैं कि यह अध्यादेश मुसलमानों के लिए सराहनीय है सिवाय उन कुछ लोगों के जो इसका सियासी फायदा उठाना चाहते थे।
तीन तलाक तो पहले से अनुचित
इस्लाम के पहले खलीफा अबुबकर सिद्दीक के मुताबिक एक साथ बोली गई तीन बार तलाक एक ही तलाक मानी जाएगी। तीन बार तलाक एक एक महीने के अंतराल पर तीन अलग अलग समय में दी जाएगी। इस्लाम के दूसरे खलीफा उमर फारूक के समय कुछ दिनों तक यह व्यवस्था रही, लेकिन तलाक के मामले बढ़े तो उन्होंने एक साथ तीन तलाक को मान्यता तो दी लेकिन यह व्यवस्था भी दी कि ऐसा करने वाले की पीठ पर जख्मी होने तक कोड़े बरसाए जाएंगे ताकि लोग इससे बचें।
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