हस्तिनापुर सेंक्चुरी में गंगा में कछुओं का कुनबा बढ़ने जा रहा है। जल्द ही 506 कछुओं की खेप गंगा की गोद में जाएगी। कछुआ नर्सरी केंद्र पर यह खेप तैयार है। तीन साल में गंगा किनारे 148 किसानों की मदद से 2000 कछुओं के अंडों को नष्ट होने से बचाया गया है। इनमें से 1500 को पहले ही गंगा में छोड़ा जा चुका है। इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि विलुप्त श्रेणी की कगार पर पहुंची चुकी कछुओं की प्रजाति का संरक्षण किया जा रहा है।
बिजनौर से नरौरा तक असर
बिजनौर बैराज से लेकर नरौर तक गंगा किनारे कछुओं की 12 प्रजातियां पाई जाती हैं। विश्व में कछुओं की 300 और भारत में 29 प्रजातियां हैं। प्रदेश में 15 कछुओं की प्रजातियां हैं। छह प्रजातियां विलुप्त श्रेणी की कगार पर पहुंच चुकी हैं। अहम बात यह है कि गंगा किनारे बिजनौर बैराज से लेकर नरौरा तक सिंचाई काम भी होता है। इस वजह से कछुआ जो अंडे देते हैं वह कल्टीवेशन के दौरान नष्ट हो जाते हैं। यह वजह है कि कछुओं की संख्या घट रही है। इस वजह से हस्तिनापुर सेंक्चुरी में 2013 में कछुओं के अंडों का संरक्षण करने कार्यक्रम शुरू किया गया।
गंगा की कर रहे सफाई
कछुओं के लेकर मिथ है कि वह विष्णु भगवान का कच्छप अवतार है। इसके अलावा अपनी कई खासियत की वजह से कछुआ जाना जाता है। मुख्य रूप से यह दो प्रकार स्थलीय और जलीय होते हैं। कछुआ सर्वहारा होता है। यह सब कुछ खा लेता है। यही वजह है कि गंगा की सफाई करने में यह महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इकोलॉजी को बनाए रखता है। नवंबर से लेकर अप्रैल के मध्य तक कछुआ अंडे देते हैं। गंगा किनारे खेती होने की वजह से किसान खाद पानी देते रहते हैं। उससे अंडे नष्ट हो जाते हैं। डब्लूडब्लूएफ के साइंटिस्ट संजीव यादव कछुओं को संरक्षित करने का काम कर रहे हैं।
कछुओं की नई खेप जल्द ही रिलीज की जाएगी। गंगा और पर्यावरण के लिए कछुओं का महत्व काफी खास है। इनकी संख्या और प्रजाति कम न हो इसके लिए प्रयास किया जा रहा है। मुकेश कुमार, मुख्य वन संरक्षक