- पांडवों की नगरी में स्थित है शिव आराधना का केंद्र
संवाद न्यूज एजेंसी
हस्तिनापुर। समय की धूल बहुत कुछ ढक देती है। राजमहल बदल जाते हैं, रास्ते बदल जाते हैं, पीढ़ियां गुजर जाती हैं लेकिन कुछ स्थान ऐसे होते हैं, जहां समय ठहर-सा जाता है। हस्तिनापुर का पांडेश्वर महादेव मंदिर ऐसा ही एक धार्मिक स्थान है।
सावन माह में हर सुबह की पहली किरण जैसे ही हस्तिनापुर की धरती को छूती है, पांडेश्वर महादेव मंदिर की ओर बढ़ते कदमों के साथ घंटियों की आवाज सुनाई देने लगती है। कोई हाथ में गंगाजल लिए है, किसी की हथेली में बेलपत्र है तो कोई आंखें बंद कर मन-ही-मन अपनी मुराद महादेव के चरणों में रख रहा है। मंदिर के भीतर शिवलिंग पर गिरती जल की एक-एक बूंद मानो सदियों पुरानी उस आस्था की कहानी कहती है, जो समय के साथ और गहरी होती चली गई।
पांडेश्वर महादेव मंदिर हस्तिनापुर की धार्मिक पहचान का ऐसा अध्याय है, जिसके साथ इतिहास, पौराणिक मान्यताएं और लोकविश्वास एक साथ जुड़े दिखाई देते हैं। पांडव टीले के समीप स्थित इस प्राचीन मंदिर को लेकर मान्यता है कि पांडवों ने यहां भगवान शिव की आराधना की थी। स्थानीय परंपराओं में मंदिर का संबंध महाभारतकालीन घटनाओं से जोड़ा जाता है। इन मान्यताओं का पौराणिक महत्व भी है। और द्वापर युग से आज तक श्रद्धालुओं के लिए इनका विश्वास ही सबसे बड़ा प्रमाण है।
सावन में उमड़ता है आस्था का सैलाब
श्रावण मास में पांडेश्वर महादेव का स्वरूप और भी जीवंत हो उठता है। गंगाजल लेकर पहुंचते कांवड़ियों के कदम, मंदिर परिसर में गूंजते जयकारे और भोलेनाथ के जलाभिषेक के लिए लगी कतारें पूरे वातावरण को शिवमय कर देती हैं। कोई संतान की कामना लेकर आता है, कोई परिवार की सुख-शांति के लिए प्रार्थना करता है और कोई केवल इस विश्वास से शीश नवाता है कि महादेव के दरबार से कोई खाली नहीं लौटता। यहां आने वाले श्रद्धालुओं के लिए जलाभिषेक केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि अपने भीतर का भार भोलेनाथ के चरणों में छोड़ देने जैसा है।
हस्तिनापुर में पांडवों द्वारा स्थापित प्राचीन पांडेश्वर महादेव मंदिर स्रोत संवाद