कैंसर ... यह वह शब्द है जिसे सुनकर रूह कांप जाती है। एक समय था जब इस बीमारी के इक्का-दुक्का मरीज मिला करते थे लेकिन अब कैंसर के मरीज तेजी से बढ़ रहे हैं। इस बीमारी के इलाज में सरकारी चिकित्सा सेवाएं मरीजों की संख्या के सामने बेहद सीमित हैं। हालत यह है कि मेडिकल कॉलेज में तो रोजाना 60 से 65 मरीज की ओपीडी होती है जबकि जिला अस्पताल में कैंसर का इलाज नहीं है।
मेडिकल कॉलेज में दो कंसलटेंट, तीन सीनियर रेजिडेंट डॉक्टर और 3 जूनियर डॉक्टर के अलावा रेडियो थेरेपिस्ट हैं। मेडिकल कॉलेज की चिकित्सक डॉक्टर शिवानी मेहरा कहती हैं कि कैंसर का इलाज अब संभव है। इसकी जानकारी शुरुआती दौर में हो जाए तो मरीज की जान को कोई खतरा नहीं होता। उनका कहना है कि सबसे ज्यादा मामले मुंह और स्तन कैंसर के आ रहे हैं। इसके अलावा बोन कैंसर और फेफड़ों के कैंसर के मामले भी लगातार आ रहे हैं।
मेडिकल कॉलेज में रेडियोथेरेपी मरीजों को लगातार दी जा रही है। उन्होंने बताया कि रोजाना 10 से 12 मरीजों को अभी थेरेपी दी जा रही है। मशीन में कुछ समस्या के कारण यह कमी आई है जबकि रोजाना 20- 22 मरीजों को यह थेरेपी दी जा रही थी। वहीं, दूसरी ओर जिला अस्पताल में कैंसर के मरीजों के इलाज की अभी कोई व्यवस्था नहीं है। ऐसे में मरीजों को इलाज नहीं मिल पाता। कैंसर से ग्रस्त मरीजों के लिए निजी अस्पतालों में इलाज करना बहुत महंगा है। जो लोग निजी अस्पताल में इलाज नहीं करवा पाते उन्हें दिल्ली का रुख करना पड़ता है, जिसमें समय के साथ ही पैसा भी बहुत लगता है।
प्रदूषण बन रहा कैंसर के बड़ी वजह
एकेडमी ऑफ पलमोनरी इंटर्नल एंड इमरजेंसी मेडिसिन क्रिटिकल केयर फाउंडेशन की ओर से 2 दिन पहले हुई वार्षिक बैठक में सामने आया कि प्रदूषण कैंसर की एक बड़ी वजह है। पाईसेफ मेरठ शाखा की ओर से वार्षिक सीएमई में डा. प्रफुल पांडेय ने कहा कि केंसर का सबसे बड़ा कारण प्रदूषण बनता जा रहा है। फेफड़ों के कैंसर का भी यह एक बड़ा कारण है। उन्होंने कहा कि वायु प्रदूषण से बचाव बेहद जरूरी है। केवल साधारण मास्क और एयर प्यूरीफायर्स से इसका खतरा कम नहीं होता। ऐसे में एन 90 या एन 95 मास्क का प्रयोग ही कारगर है।