चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय में जब से शिक्षा का निजीकरण हुआ, घोटाले दर घोटाले सामने आते गए। खासतौर पर बीएड कालेजों की बंदरबांट और फिर दाखिलों के घोटालों के छींटे सन 1998 के बाद तमाम कुलपति के दामन पर आए। जो इस सिस्टम से तालमेल नहीं बैठा सके, हाथ जोड़कर निकल गए और जो रहे, वो सब फंसे। कोई भ्रष्टाचार के आरोप में बर्खास्त हुआ तो कोई जांच के दायरे में है।
ताजा मामला चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. एनके तनेजा के खिलाफ भ्रष्टाचार और धोखाधड़ी के मामले में नामजदगी का है। मेडिकल थाने में उत्तर प्रदेश सतर्कता अधिष्ठान (विजिलेंस) की तरफ से दर्ज कराई गई रिपोर्ट में पूर्व कुलपति प्रो. एसके काक के साथ वर्तमान कुलपति प्रो. एनके तनेजा समेत 13 लोगों को रुद्राक्ष इंस्टीट्यूट ऑफ एजुकेशन एंड टेक्नोलॉजी को शैक्षिक सत्र 2009-10 हेतु 100 सीटों हेतु संबद्धता देने के मामले में सहआरोपी बनाया गया है। प्रो. एनके तनेजा के मामले में विजिलेंस की जांच किस मंजिल तक पहुंचेगी, आरोप कितने साबित होंगे, ये तो आने वाला वक्त ही बताएगा। लेकिन इस प्रकरण से 22 साल पहले विश्वविद्यालय में निजी कालेजों की मान्यता दिए जाने के बाद शुरू हुए घोटालों की याद ताजा हो गई है।
दागदार होते रहे हैं सभी के दामन
1995 के दौर में कैंपस में छात्रों की संख्या महज पांच सौ के करीब ही थी। विभागों की बात करें तो एमए, एमएससी, एमफिल, एमएससी हॉर्टीकल्चर और पीएचडी को छोड़कर कोई दूसरा कोर्स नहीं था। तत्कालीन कुलपति डॉ. केसी पांडे के कार्यकाल में एमबीए की शुरुआत हुई। इसके बाद साल 1997 में निजी बीएड कालेजों को मान्यता देने का काम शुरू हो गया। यहीं से विश्वविद्यालय में भ्रष्टाचार की नींव भरनी शुरू हुई। डॉ. केसी पांडे पर भारी अनियमितताओं के आरोप लगे। आंदोलन हुए। उनको हटना पड़ा। फिर आए साल 2000 में कुलपति रमेश चंद्रा। उनके कार्यकाल में विश्वविद्यालय की सूरत बदल गई। नए विभाग खुले। नए भवन बने। जंगल की तरह नजर आने वाला विश्वविद्यालय पार्क और खूबसूरत इमारत में तब्दील हो गया। लेकिन रमेश चंद्रा भी अपनी साख नहीं बचा पाए। उन पर अनियमितताओं के आरोप लगे। एक मामले में उनके खिलाफ रिपोर्ट हुई। दो महीने तक तत्कालीन कमिश्नर पर कुलपति का चार्ज रहा। हालांकि बाद में हुई जांच में रमेश चंद्रा को क्लीन चिट मिल गई। साल 2003 में आरपी सिंह कुलपति बने। उनके कार्यकाल में निजी कालेजों की सबसे ज्यादा बंदरबांट हुई। गंभीर आरोपों के चलते 2006 में शासन ने उनको बर्खास्त कर दिया। इसके बाद प्रो. एसपी ओझा को कुलपति बनाया गया। उनके कार्यकाल में हुए कॉपी मूल्यांकन घोटाले से देशभर में विश्वविद्यालय का नाम खराब हुआ। साल 2009 में प्रो. एसके काक को कुलपति बनाया गया। उनके खिलाफ कालेजों को गलत तरह से मान्यता देने के मामले में शिकायत हुई। जिस पर हाल में विजिलेंस ने मेडिकल थाने में रिपोर्ट दर्ज कराकर आगे की जांच शुरू कर दी है।