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Meerut News: अपने भक्तों को मुक्ति देता है मां काली का दूसरा स्वरूप

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हस्तिनापुर। पांडव टीले पर मौजूद प्राचीन जयंती माता शक्तिपीठ मंदिर में माघ महीने के गुप्त नवरात्रों में दूसरे दिन श्रद्धालुओं द्वारा विधि विधान से माता महाविद्या देवी तारा की पूजा की गई।
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मंदिर के संस्थापक अध्यक्ष सुदेश कुमार ने बताया कि यह मां काली का दूसरा स्वरूप है। तारा देवी नर-मुंड की माला पहनती हैं और इन्हें तंत्र शास्त्र की देवी माना गया है। माना जाता है कि वह मुक्ति देने वाली देवी हैं। उन्होंने बताया कि अन्य धर्म में भी मां तारा की पूजा-अर्चना को बहुत महत्व दिया जाता है। मान्यता है कि भगवान बुद्ध ने भी मां तारा की आराधना की थी। गुरु वशिष्ठ ने भी पूर्णता प्राप्त करने के लिए मां तारा की आराधना की थी।इनकी पूजा से सारे कष्ट मिट जाते है। मां तारा देवी के तीन रूप हैं उग्र तारा, एकजटा और नील सरस्व है। इस अवसर पर पंडित मोहित शर्मा ने बताया कि मां तारा देवी की कहानी मां तारा देवी की उत्पत्ति से जुड़ी पौराणिक कथा प्रचलित है। जिसके अनुसार, मां तारा देवी का जन्म मेरु पर्वत के पश्चिम भाग में चोलना नदी के किनारे पर हुआ था। हयग्रीव नाम के एक दैत्य का वध करने के लिए मां महाकाली ने नील वर्ण धारण किया था। ऐसी मान्यता है कि भगवान शिव जी ने मां पार्वती को बताया कि आदि काल में आपने भयंकर मुख वाले रावण का विनाश किया, तब से आपका यह स्वरूप तारा नाम से जाना जाता है। उस समय सभी देवताओं ने आपकी स्तुति की थी। आप अपने हाथों में खड़ग, नर मुंड, वार तथा अभय मुद्रा धारण की हुई थी। मुख से चंचल जिह्वा बाहर कर आपने भयंकर रूप धारण किया था। आपका वह विकराल रूप देख सभी देवता भयभीत होकर कांप रहे थे। आपके विकराल भयंकर रुद्र रूप को देखकर शांत करने के लिए ब्रह्मा जी आपके पास गए थे। भगवान राम की विध्वंसक शक्ति देवी तारा ही थी, जिन्होंने लंका पति रावण का वध किया था। इस अवसर पर ज्योति शर्मा, काजल, मानसी, शिवम शर्मा, कृष्ण सैनी, रामपाल आदि मौजूद रहे।
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