मेरठ। वर्षों पहले तक सेंक्चुअरि में बारहसिंगा का झुंड कुलांचे भरता नजर आते था। वहीं, गत वर्ष हुई गणना में अब इनकी संख्या घटकर महज नौ रह गई है। घास के घटते मैदान और सेंक्चुअरि का नोटिफिकेशन नहीं होने से अवैध निर्माणों ने बारहसिंगा का घर छीन लिया है। इसके चलते बारहसिंगा उत्तराखंड के जंगलों का रुख कर रहे हैं। यदि इनके संरक्षण के लिए जल्द कदम नहीं उठाए गए तो सेंक्चुअरि से बारहसिंगा विलुप्त हो जाएगा।
बारहसिंगा पर शोध कर रहे वाइल्ड लाइफ एक्सपर्ट बताते हैं कि बारहसिंगा दुर्लभ वन्य जीव होने की वजह से संकटग्रस्त सूची में है। इसकी ऊंचाई 135 सेंटीमीटर तथा वजन 160 किलो तक होता है। बारहसिंगा घास और पेड़ों की पत्तियां खाता है। इसे दलदली जमीन बहुत भाती है। इसके लिए हस्तिनापुर सेंक्चुअरि उपयुक्त है। शोध के मुताबिक उत्तराखंड से पहले बड़ी संख्या में बारहसिंघा हस्तिनापुर सेंक्चुअरि आते थे। हालांकि सेंक्चुअरि में रहवास कम होने तथा तेंदुए की आमद बढ़ने से बारहसिंगा पलायन कर रहा है।
हस्तिनापुर वन अभयारण्य में मेरठ के साथ बिजनौर और अमरोहा जिले की भी सीमा लगती है। सरकार की ओर से सेंक्चुअरि की अधिसूचना जारी नहीं होने से अभयारण्य क्षेत्र का विकास नहीं हुआ। हस्तिनापुर अभयारण्य अंतर्गत बिजनौर और चांदपुर शहर विकसित हो गए। अधिसूचना जारी नहीं होने से यह बढ़ता जा रहा है। इसके चलते वन विभाग भी विकास एवं औद्योगिक गतिविधियों को रोकने में सख्ती नहीं करता है। इन सभी वजह से बारहसिंगा समेत विभिन्न प्रजाति के हिरन खतरे में पड़ रहे हैं।
बारहसिंगा के बारे में
प्रजनन काल सितंबर से अप्रैल तक
240-250 दिन के गर्भकाल के बाद बच्चे का जन्म अगस्त से नवंबर में होता है। यह एक समय में एक ही बच्चे को जन्म देता है। यह सवेरे और शाम अधिक खाना पसंद करता है। भयभीत होने पर तीखे स्वर में चिल्लाता है।
बंदी अवस्था में यह 23 वर्ष तक जीवित पाया गया है।
यहां रहता है एक जोड़ा
सिटी स्टेशन के समीप छावनी क्षेत्र में दलदली जमीन और जंगल होने के कारण वर्षों से बारहसिंगा का एक जोड़ा रहता है। वन विभाग के कर्मचारियों ने इनको सेंक्चुअरि में छोड़ने का प्रयास किया, लेकिन सफल नहीं हुए।
वाइल्ड लाइफ अधिकारी बताते हैं कि बारहसिंगा का दिल बेहद नाजुक होता है। उसके साथ जबरदस्ती करने पर जान को खतरा हो सकता है। वह खुद को नुकसान पहुंचा सकता है।