सुप्रीम कोर्ट के फैसले से खुश हुई महिलाएं
तलाक, तलाक, तलाक, जिंदगी के किसी मोड़ पर इन्हीं तीन शब्दों ने कानों में बदनसीबी का वो जहर घोला जो जिंदगी के लिए नासूर बन गया। आज सालों बाद जब उन्हीं कानों ने तीन तलाक को असंवैधानिक करार सुना, तो लगा जुमे की नमाज अता की हो। तलाक के कड़वे सच से गुजरने वाली महिलाओं के लिए मंगलवार का दिन ईद और रमजान के जुमे से कम न था। सुप्रीम कोर्ट ने जैसे ही तीन तलाक को गलत बताकर केंद्र को इस पर कानून बनाने का फरमान जारी किया, तो कई आंखें फैसले की खुशी से नम हो गईं। हर जुबां अल्लाह का शुक्रिया करते हुए यही दोहरा रही थी कि आजादी का असली सुकून क्या होता है ये आज महसूस हुआ। नम आंखों से उन तलाक पीड़िताओं ने सुप्रीम कोर्ट को दुआ दी, जिसने आज देश की लाखों मुस्लिम महिलाओं को सम्मान से जीने का हक दिया है।
तलाक, तलाक, तलाक कहकर छोड़ दिया था
तीन तलाक पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला
नहरड़ा गांव की रहने वाली अमरीन और फरहीन दोनों सगी बहनें हैं। अपने तीन तलाक की कहानी बयां करते हुए फरहीन कहती हैं कि हमारा निकाह एक ही घर में दो सगे भाइयों से हुआ था। एक दिन अमरीन के बेटे ने मेरे पति से पांच रुपये मांगे तो उन्होंने पैसे देने से इंकार कर दिया। मैंने उन्हें पैसे देने को कहा। बस इतनी सी बात पर मेरे पति नाराज हो गए। हम दोनों बहनों से मायके से एक लाख रुपये लाने को कहकर हमें घर से निकाल दिया। मजबूरी में हम बहनें मायके चले गईं। कुछ दिन बाद वापस लौटे तो हमारे पतियों ने हमें तलाक, तलाक, तलाक कहकर छोड़ दिया। सालों का नाता एक पल में टूट गया। तब से हम कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं। हमारे बच्चे अब्बा की मोहब्बत से दूर हैं। हमारा पूरा परिवार तीन तलाक से बिखर गया। आज कोर्ट ने जो यह फैसला दिया है उससे दिली खुशी मिली है कि हमारे बच्चों की तरह दूसरे बच्चे अब्बा के प्यार से दूर नहीं रहेंगे।
नहीं भूला जाता तलाक का वो मनहूस दिन
तीन तलाक खत्म
निकाह का जो पाक रिश्ता पति-पत्नी को उम्रभर के लिए बांधता है, उस रिश्ते को महज तीन बार तलाक बोलकर तोड़ने का वो मंजर शबनम को आज भी नहीं भूलता। बाउंड्री रोड निवासी शबनम को उसके शौहर ने तलाक क्यों दिया ये सवाल आज भी शबनम के लिए अबूझ पहेली है। शबनम कहती हैं कि शौहर ने मुझे क्यों छोड़ा ये आज भी नहीं मालूम। मुझे गम ये है कि उन्होंने मेरे साथ बच्चों से भी मुंह फेर लिया। एक अकेली औरत जो शौहर के साथ हर सुख, दुख में साथ निभाने का वादा करती है, उसे उसका पति सिर्फ तीन बार तलाक कहकर अपनी मर्जी से छोड़ जाता है। ये कहां का न्याय है। तलाक के बाद मैंने किसी तरह काम करके अपने बच्चे बड़े किए और उन्हें काबिल बनाया, लेकिन तलाक के वो तीन शब्द आज भी मेरी रूह को कंपा देते हैं। सुप्रीम कोर्ट का फैसला बहुत देर से आया। कई औरतें तीन तलाक का शिकार हो चुकी हैं। फैसले पर जल्द कानून बनना जरूरी है।
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