कभी-कभी कोई सम्मान सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं होता बल्कि वह पूरी साहित्यिक परंपरा, संवेदना और शब्द-साधना का अभिनंदन बन जाता है। मसलन, जब एक कवि को सम्मानित किया जाता है तो उसकी कविता, उसकी चेतना और उसके माध्यम से जाग्रत हुआ समाज सम्मान के मंच पर विराजमान होता है। ऐसा ही एक ऐतिहासिक और गौरवपूर्ण क्षण तब साकार हुआ जब मेरठ के ओजस्वी कवि डॉ. हरिओम पंवार को उत्तर प्रदेश गौरव सम्मान से अलंकृत किया गया। यह सम्मान साहित्य प्रेमियों के लिए न केवल गर्व का विषय है बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा की नजीर भी है।
24 जनवरी को उत्तर प्रदेश स्थापना दिवस के अवसर पर लखनऊ स्थित राष्ट्र प्रेरणा स्थल पर आयोजित भव्य समारोह में मंच पर जब डा. हरिओम पंवार का नाम पुकारा गया तो वह केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि पांच दशकों की काव्य साधना का उद्घोष था। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने कहा कि डॉ. हरिओम पंवार की कविताएं पूरी सटीकता और सतर्कता के साथ समाज को जागरूक करती हैं। 24 मई 1951 को बुलंदशहर में जन्मे डॉ. हरिओम पंवार की काव्य यात्रा केवल मंच तक सीमित नहीं रही। मेरठ कॉलेज में कानून के प्रोफेसर और डीन रह चुके डॉ. पंवार ने साहित्य को सामाजिक दायित्व से जोड़ा। कवि सुमनेश सुमन के अनुसार, कवि सम्मेलनों से प्राप्त मानदेय का एक बड़ा हिस्सा वे ‘वाणी फाउंडेशन’ के माध्यम से गरीब बच्चों की शिक्षा में समर्पित करते हैं। साथ ही साहित्यकारों को सम्मानित करने और राष्ट्रनायकों की स्मृति में कवि सम्मेलनों के आयोजन करते हैं।
डा. पंवार की ललकार पर हिलती रही सरकार
वीर रस के प्रखर कवि डॉ. हरिओम पंवार ने पिछले पचास वर्षों में अपनी कविताओं के माध्यम से सामाजिक और राष्ट्रीय मुद्दों पर सत्ता और समाज का ध्यान आकृष्ट किया है। अनुच्छेद 370, हर घर जल योजना, खाद्य सुरक्षा बिल, नोटबंदी जैसे विषयों पर उनकी कविताएं केवल शब्द नहीं रहीं, बल्कि व्यवस्था परिवर्तन की प्रेरणा बनीं। ‘भारत का संविधान’, ‘पोखरण’ और ‘विमान अपहरण’ जैसी उनकी कालजयी रचनाएं साहित्य और राष्ट्र के बीच सेतु का कार्य करती हैं।
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शिक्षा और संस्कार की साधना का हुआ सम्मान
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– गुरुकुल की छात्राओं को ज्ञान, संस्कार और आत्मनिर्भरता की सीख
मेरठ। कभी सपनों में सीमित नहीं रही, कभी अपने सुख-संपन्न परिवार में बैठी नहीं रह पाई। ऐसा ही साहसिक और प्रेरणादायक कदम उठाया छत्तीसगढ़ के नारंगपुर की बेटी रश्मि आर्य ने, जिन्होंने गरीब और वंचित बच्चियों के लिए शिक्षा की अलख जगाई। उत्तर प्रदेश गौरव सम्मान से सम्मानित रश्मि आर्य की कहानी फिल्म सरीखी है, लेकिन वास्तविक और प्रेरक।
संपन्न परिवार में जन्मी रश्मि आर्य गरीब बच्चों की कठिनाइयों को देख मन ही मन परेशान हो जाती थीं। 10 जुलाई 2000 को उन्होंने घर छोड़ने का साहसिक निर्णय लिया और केवल अपनी भाभी को अपनी योजना बताई। राजस्थान होते हुए मध्य प्रदेश पहुंचीं, जहां माता प्रेमलता शास्त्री से उनका संपर्क हुआ। यही से उन्हें दिशा मिली और वर्ष 2005 में वे परीक्षितगढ़ के नारंगपुर में एक छोटे से कमरे से लड़कियों की शिक्षा का अभियान शुरू किया। शुरू में केवल पांच लड़कियां पढ़ने आती थीं।
साल 2007 में दो बीघा जमीन लेकर उन्होंने आर्य कन्या गुरुकुल की नींव रखी, जो अब आठ बीघा में फैला है। गुरुकुल में छात्राओं को न केवल 12वीं तक की पढ़ाई कराई जाती है, बल्कि उनकी परास्नातक शिक्षा का जिम्मा भी गुरुकुल उठाता है। आज यहां सौ से अधिक लड़कियां पढ़ रही हैं। रश्मि आर्य ने गुरुकुल को केवल शिक्षा केंद्र नहीं, बल्कि संस्कार, आत्मनिर्भरता और सामाजिक चेतना का स्थल बनाया। छात्राओं को कंप्यूटर शिक्षा, खेलकूद और नैतिक शिक्षा में प्रशिक्षित किया जाता है। उनके नेतृत्व में गुरुकुल ने न केवल शैक्षणिक गुणवत्ता में सुधार किया है बल्कि छात्राओं को समाज के प्रति जागरूक और सशक्त बनाने में भी अग्रणी भूमिका निभाई है।
गुरुकुल बना मेरठ की पहचान
महिला सशक्तिकरण और सामाजिक जागरूकता के लिए रश्मि आर्य समय-समय पर कार्यक्रम, प्रशिक्षण शिविर और सामाजिक गतिविधियां आयोजित करती रहती हैं। उनके प्रयासों से गुरुकुल की पहचान स्थानीय स्तर से लेकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भी मजबूत हुई है। सम्मान मिलने पर गुरुकुल परिवार, छात्राओं और क्षेत्रवासियों में खुशी का माहौल रहा। रश्मि आर्य ने यह सफलता गुरुकुल परिवार और क्षेत्रवासियों के सहयोग का परिणाम बताया। उन्होंने कहा, “यह सम्मान हमें समाज और शिक्षा के क्षेत्र में और अधिक समर्पण के साथ कार्य करने के लिए प्रेरित करेगा।”