बहसूमा। दाल के दाम सातवें आसमान पर हैं। इनके बावजूद दलहनी फसलें किसानों को नहीं लुभा पा रही हैं। जिसके चलते दलहन की खेती का पश्चिमी उत्तर प्रदेश में रकबा लगभग खत्म हो गया है। इसके पीछे दलहन की कमजोर खेती एवं बाजार में मूल्य नहीं मिलना माना जा रहा है। दलहन की खेती से जुडे़ जोखिम के चलते किसान इससे दूर भाग रहा है। इसके पीछे मुख्य कारण गन्ने की खेती को माना जा रहा है। बारिश हो चाहे सूखा फिर भी गन्ने की लागत देर सबेर मिल जाती है। दलहनी फसल में यदि रोग आ जाए तो यह बर्बाद हो जाती है।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अधिकतर किसानों का इसके पीछे तर्क है कि दलहनी फसलों में सबसे अधिक रोग लगते हैं। उत्पादन लागत बढ़ने और बाजार मूल्य में तालमेल नहीं होने से किसान इससे दूर भागने लगा है। किसान ओमी गुर्जर का कहना है कि उनके यहां सेंक्चुरी क्षेत्र होने के साथ नील गाय एवं जंगली आवारा पशु बड़ी संख्या में दलहनी फसलों का दुश्मन हैं। इसकी सरकारी खरीद की व्यवस्था भी नहीं है। इन्हीं दिक्कतों के कारण दलहन की खेती के बजाए किसानों का रुझान गेहूं एवं धान पर है। परिणामस्वरूप दालें लोगों की पहुंच से बाहर हो गईं। घरेलू पैदावार में उसके अनुरूप बढ़ोतरी नहीं होना चुनौती है। गन्ने की ओर रुझान होना भी इसकी वजह माना जा रहा है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मेरठ को गन्ने की बेल्ट कहा जाता है।