बागपत। केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय के अधीन भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग उत्खनन शाखा द्वितीय और भारतीय पुरातत्व संस्थान लाल किला की संयुक्त टीम के उत्खनन से बरनावा टीले को लेकर सदियों से चले आ रहे राज से पर्दा हट सकेगा। निदेशक पुरावशेष डॉ. डीएन डिमरी ने कहा उत्खनन का उद्देश्य यह जानना है कि इस क्षेत्र में किन-किन सभ्यताओं के अवशेष हो सकते हैं। यह भी स्पष्ट हो सकेगा कि बरनावा का महाभारत काल से कितना और कैसा संबंध रहा है।
केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय ने बरनावा में दिसंबर 2017 से मई 2018 तक उत्खनन कार्य को मंजूरी दी है। बरनावा टीले के अलावा हिंडन और कृष्णा नदी के आसपास खुदाई की तैयारी है। केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय के अधीन भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग उत्खनन शाखा द्वितीय और भारतीय पुरातत्व संस्थान लाल किला की संयुक्त टीम बरनावा के लाक्षा गृह टीले की विधिवत विस्तृत उत्खनन करेगी। पुरातत्व संस्थान के निदेशक डॉ. एसके मंजुल के निर्देशन में यह खुदाई का कार्य किया जाएगा। बरनावा का टीला असल में सदियों से लोगों के लिए उत्सुकता है। सवाल सैकड़ों हैं। पुरातत्व विभाग ने इसे संरक्षित किया है। निदेशक पुरावशेष डॉ. डीएन डिमरी का कहना है कि उत्खनन से स्पष्ट हो सकेगा कि आखिर बरनावा क्षेत्र में इतिहास में कौन-कौन सी सभ्यताएं रही हैं। यहां के लोगों का रहन-सहन क्या था और किस तरह लोग अपना जीवन यापन करते थे। खुदाई से ही यह भी स्पष्ट होगा कि महाभारत का इस पूरे क्षेत्र से कितना जुड़ाव रहा है।
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