मेरठ। केंद्रीय आर्य सभा के तत्वावधान में आर्य समाज दयानंद पथ सदर में बुधवार को स्वामी श्रद्धानंद जी का बलिदान दिवस मनाया गया। इस दौरान वक्ताओं ने स्वामी जी के जीवन पर प्रकाश डाला।
कार्यक्रम का शुभारंभ आचार्य देव शर्मा के ब्रह्मत्व में देवयज्ञ से किया। यजमान ज्ञानप्रभा, अजय कुमार, मनीष शर्मा एवं विजय प्रेमी रहे। कार्यक्रम का संचालन राजेश सेठी ने किया। उन्होंने कहा कि 1879 में स्वामी श्रद्धानंद जी बरेली में महर्षि दयानंद सरस्वती से मिले थे। स्वामी श्रद्धानंद जी का पूर्व नाम मुंशीराम था। इससे उनके जीवन में आमूल-चूल परिवर्तन आया। वह नास्तिक से आस्तिक बन गए। समस्त व्यसनों का परित्याग कर 1884 में आर्य समाज लाहौर के सदस्य बने और अपना तन-मन-धन लोकसेवा को समर्पित कर दिया। उन्होंने 1902 में गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय की स्थापना की।
पंडित कुलदीप आर्य ने भजनों के माध्यम से स्वामी श्रद्धानंद जी के महान कार्यों का गुणगान किया। मुख्य वक्ता आचार्य पुनीत शास्त्री ने कहा कि स्वामी श्रद्धानंद जी ने संपूर्ण जीवन मानव कल्याण के लिए समर्पित किया। 30 मार्च 1919 को चांदनी चौक टाऊन हॉल के सामने आंदोलन करते हुए उन्होंने अंग्रेजी सेना के सामने सीना खोलकर गोली चलाने की चुनौती दी थी। जलियांवाला बाग की दमनकारी घटना के बाद उन्होंने अमृतसर में कांग्रेस का अधिवेशन कराकर ऐतिहासिक काम किया। उन्होंने तुष्टिकरण की नीति के विरोध में कांग्रेस छोड़ दी। उन्होंने अछूतोद्धार एवं शुद्धि आंदोलन से देश की अमूल्य सेवा की। उनका 23 दिसंबर 1926 को बलिदान हुआ। उनके कार्य हम सभी को प्रेरणा देते रहेंगे।
सभा प्रधान डॉ. आरपी सिंह चौधरी ने सभी श्रोताओं का आभार जताया। यहां चंद्रकांत, अशोक सुधाकर, मांगेराम, सुशील बंसल, भुपेंद्र सक्सेना, सुशील त्यागी, रवींद्र सिंह, आनंद प्रकाश त्यागी, दीपक शास्त्री, मुकेश आर्य, ज्ञान मुनि, अपर्णा, अरविंद, प्रीति सेठी, इंदिरा राजवंशी रहे।