नॉर्थ जोन इन्फर्टीलिटी कॉन्फ्रेंस में शामिल हुए चिकित्सक।
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एडवांसमेंट का असर पुरुषों में शुक्राणु पर पड़ रहा है। काम का दबाव और तनाव की वजह से भी यह दिक्कत बढ़ रही है। वर्किंग डेज ज्यादा होने और अनियमित खानपान शुक्राणु कम हो रहे हैं। यह बात नॉर्थ जोन इन्फर्टीलिटी कॉन्फ्रेंस में गुवाहाटी से आए डॉ. धीरेन दत्ता ने कही।
डॉ. सिंट टेस्ट ट्यूब बेबी सेंटर, एपकोट आईवीएफ नोएडा और मेरठ ऑब्स एंड गायनेकोलॉजिकल सोसाइटी द्वारा आयोजित कॉन्फ्रेंस में डॉ. धीरेन ने कहा कि पुरुष जितने एडवांस हो रहे हैं, इसका असर उनके शुक्राणु पर देखने को मिल रहा है। पहले कॅरियर सेट करते हैं। शादी 30 साल के बाद कर रहे हैं। कभी-कभी तो यह 35 के पार हो रही है। ऐसे में शुक्राणु का परसेंटेज कम हो जाता है।
नौकरी में देखने में आ रहा है कि वर्किंग डेज ज्यादा हैं।काम का दबाव और तनाव अधिक है। इसका असर भी पड़ रहा है। आधुनिक खानपान भी इसकी वजह है। डॉ. दत्ता ने डब्ल्यूएचओ (विश्व स्वास्थ्य संगठन) के मानक और क्या करना चाहिए, इस बारे में जानकारी दी।
रिसर्च पर दिया जोर
इंडियन सोसाइटी ऑफ असिस्टेड रीप्रोडक्ट्स के पूर्व अध्यक्ष डॉ. धीरज गांडा ने कहा कि इन्फर्टीलिटी के मरीजों की जांच कैसे कम हो, इस पर रिसर्च की जरूरत है। वजह यह कि जांच अधिक होने से खर्च बढ़ता है। उन्होंने कहा यूट्रस ट्रांसप्लांट की जरूरत भी होने लगी है।
जागरूकता से मदद
कॉन्फ्रेंस के आयोजक अध्यक्ष डॉ. अनिरुद्ध सिंह ने कहा कि मेरठ में इस तरह के मुद्दों पर राष्ट्रीय स्तर की कॉन्फ्रेंस के लिए इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलप हो रहा है। लोग जागरूक हो रहे हैं। निसंतान दंपत्ति के इलाज में इससे मदद मिलेगी। डॉ. शशि सिंह ने कहा कि दो दिवसीय कॉन्फ्रेंस में इन्फर्टीलिटी के विभिन्न बिंदुओं पर चर्चा हुई। इसमें देश के विभिन्न शहरों से आए विशेषज्ञों ने अपने विचार रखे।