भक्तामर विधान पाठ में पूजा अर्चना करते श्रद्धालु।
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हस्तिनापुर। जैन दर्शन में प्रणाम ही सबसे बड़ा मंत्र है। मन, वचन व कार्य से समर्पित होकर किया गया नमस्कार ही फलदायी है। जब तक नमस्कार नहीं तब तक परमात्मा का पुरस्कार भी संभव नहीं है। यह प्रवचन रविवार को भक्तामर विधान एवं पाठ के 10वें दिन श्री निर्वाण भूषण जी महाराज ने दिए।
कैलाश पर्वत स्थित दिगंबर जैन मंदिर में विश्व की सुख, शांति, समृद्धि के लिए 48 दिवसीय भक्तामर विधान एवं पाठ का आयोजन चल रहा है। दसवें दिन विधानाचार्य सुदीप शास्त्री ने मांगलिक मंत्रों से क्रियाओं का शुभारंभ किया। समस्त स्थानीय जैन समाज, बड़ा मंदिर व गुरुकुल स्टाफ एवं बच्चों ने भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। गुरुवर श्री निर्वाण भूषण जी महाराज ने अपने कहा कि प्रणाम का तात्पर्य विनम्रता से होता है, खुद को प्रभु के आगे नतमस्तक करने से है। आयु, विद्या, यश और बल को प्रदान करने वाला है प्रणाम। जब मानव किसी से विनम्र पूर्वक व्यवहार करता है तो सदा ही उसके दिल में जगह बना लेता है। दूसरे के मुख से स्वत: ही आशीर्वाद के मधुर वचन निकलने लगते हैं। इसलिए जैन ग्रंथों व शास्त्रों में सबसे पहले पंच परमेष्ठी को प्रणाम किया गया। इससे प्रभु की कृपा हम पर बनी रहे। आज के विधान का विसर्जन महेंद्र जैन प्रधानाचार्य हस्तिनापुर ने किया। पंच परमेष्ठी की आरती का दीप प्रज्ज्वलन विजय जैन ने सपरिवार किया। आदिनाथ भगवान की आरती का दीप प्रज्ज्वलन हेमतला जैन, चौबीसों भगवान की आरती का दीप प्रज्ज्वलन गुरुकुल के बच्चों द्वारा किया गया। मुकेश जैन, मनोज जैन, राजीव, सुभाष, प्रेम जैन, विपिन शर्मा आदि का विशेष सहयोग।